पर्युषण पर्व: आत्मशुद्धि, संयम और क्षमा का संदेश

डा नितेश कुमार गुप्ता

भारत विभिन्न धर्मों और त्योहारों की भूमि है। यहाँ मनाए जाने वाले प्रत्येक पर्व का अपना विशेष धार्मिक और सामाजिक महत्व है। जैन धर्म में पर्युषण पर्व का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व आत्मशुद्धि, संयम, तप, अहिंसा और क्षमा का संदेश देता है। पर्युषण का अर्थ है—अपने भीतर की ओर लौटना और आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करना। इस
वर्ष श्वेतांबर जैन परंपरा के अनुसार पर्युषण पर्व 8 सितंबर से 15 सितंबर तक मनाया जा रहा है। 15 सितंबर को संवत्सरी का पवित्र दिन होगा, जब जैन धर्मावलंबी एक-दूसरे से क्षमा माँगते हैं। दिगंबर परंपरा में इसके बाद 16 सितंबर से 25 सितंबर तक

दशलक्षण पर्व मनाया जाएगा।
पर्युषण पर्व के दौरान जैन धर्म के अनुयायी धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। वे उपवास, ध्यान, स्वाध्याय और पूजा-पाठ करते हैं। इस समय लोग अपने जीवन में हुई गलतियों पर विचार करते हैं और उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं। यह पर्व हमें अपनी बुरी आदतों और नकारात्मक विचारों को छोड़कर अच्छे विचारों को अपनाने की प्रेरणा देता है।

पर्युषण पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्षमा है। इस अवसर पर लोग अपने द्वारा जाने-अनजाने में किए गए अपराधों के लिए दूसरों से क्षमा माँगते हैं और दूसरों को भी हृदय से क्षमा करते हैं। जैन समाज में पर्युषण के अंत में “मिच्छामि दुक्कड़म्” कहकर सभी से क्षमा माँगने की परंपरा है। इसका भाव है कि यदि मेरे मन, वचन या कर्म से आपको किसी प्रकार का कष्ट पहुँचा हो, तो मुझे क्षमा करें। यह परंपरा आपसी प्रेम, भाईचारे और सद्भाव को बढ़ाती है।

इस पर्व में अहिंसा को भी विशेष महत्व दिया जाता है। जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव में आत्मा होती है, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना उचित नहीं है। पर्युषण हमें सभी जीवों के प्रति दया, करुणा और प्रेम रखने की शिक्षा देता है।

पर्युषण केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण और आत्म-सुधार का अवसर भी है। आज के तनावपूर्ण जीवन में यदि हम इसके संदेशों को अपनाएँ, तो हमारे जीवन में शांति और संतुलन आ सकता है। क्षमा करने से मन का बोझ कम होता है और अहिंसा तथा संयम से जीवन अधिक सुंदर बनता है।

अतः पर्युषण पर्व हमें सच्चे अर्थों में एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। हमें इस पर्व के संदेश—अहिंसा, संयम, त्याग, आत्मचिंतन और क्षमा—को केवल पर्व के दिनों में ही नहीं, बल्कि अपने दैनिक
जीवन में भी अपनाना चाहिए।

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