
वाराणसी। द्वादश अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) के उपलक्ष्य में सम्पूर्णानद संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित सप्ताहव्यापी कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत शुक्रवार को प्रातः 7 बजे ऐतिहासिक मुख्य भवन में तीन दिवसीय योग महोत्सव का भव्य शुभारम्भ कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम का आरम्भ दीप प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ। आध्यात्मिक वातावरण एवं वैदिक ध्वनियों के मध्य विश्वविद्यालय परिवार ने योग, अध्यात्म और भारतीय ज्ञान परम्परा के समन्वित स्वरूप का साक्षात्कार किया।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के अध्यापकों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए सामूहिक योगाभ्यास किया। योग प्रशिक्षक डॉ. राजकुमार मिश्र एवं आदित्य कुमार के निर्देशन में प्रतिभागियों ने ताड़ासन, वृक्षासन, अर्धचक्रासन, त्रिकोणासन, भुजंगासन, शलभासन, वज्रासन, पवनमुक्तासन, मकरासन तथा शवासन का अभ्यास किया। साथ ही कपालभाति, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी एवं ध्यान-साधना का भी प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षकों ने प्रत्येक आसन एवं प्राणायाम की वैज्ञानिक उपयोगिता तथा स्वास्थ्यवर्धक प्रभावों की जानकारी भी दी।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि योग भारत की सनातन ज्ञानपरम्परा की वह अमूल्य निधि है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को स्वास्थ्य, शांति और संतुलित जीवन का मार्ग प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि आज जब सम्पूर्ण विश्व तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवनशैली तथा मानसिक अशान्ति जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब योग मानवता के लिए आशा और समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है।
उन्होंने कहा कि योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह मन, बुद्धि, चित्त और आत्मा के परिष्कार की समग्र साधना है। योग व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है, समाज से जोड़ता है और अंततः परमात्मा से जोड़ता है। महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित योगदर्शन मानव जीवन को अनुशासन, संयम, संतुलन एवं आत्मबोध की दिशा प्रदान करता है।
कुलपति ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक है। आज विश्व के सैकड़ों देशों में योग को अपनाया जा रहा है और लोग इसके माध्यम से शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त कर रहे हैं। योग की वास्तविक सार्थकता तभी है जब इसे एक दिवस तक सीमित न रखकर दैनिक जीवनचर्या का अभिन्न अंग बनाया जाए। उन्होंने विद्यार्थियों से विशेष रूप से आह्वान किया कि वे योग को जीवन की नियमित साधना बनाकर स्वस्थ शरीर, सुदृढ़ मन और श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण करें।
योग महोत्सव से पूर्व सप्ताहव्यापी कार्यक्रमों के अंतर्गत पुरुषोत्तम मास के विशेष अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम योग (अध्याय-15) का सामूहिक सस्वर पाठ सम्पन्न हुआ। गीता पाठ का संचालन आदित्य कुमार द्वारा किया गया, जबकि योगाभ्यास का प्रशिक्षण डॉ. राजकुमार मिश्र द्वारा प्रदान किया गया। विश्वविद्यालय के समस्त अध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी एवं छात्र-छात्राओं ने श्रद्धा एवं भक्ति के साथ गीता पाठ में सहभागिता की।
कार्यक्रम के संयोजक एवं योग नोडल अधिकारी डॉ. दुर्गेश पाठक ने उपस्थित सभी प्रतिभागियों का स्वागत एवं अभिनन्दन करते हुए तीन दिवसीय योग महोत्सव की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम योग अध्याय का पाठ विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन करते हुए जीव को मोह एवं आसक्ति से मुक्त होकर परम पुरुष की शरण में जाने का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि गीता का यह अध्याय आत्मचिन्तन, वैराग्य एवं परम शांति की अनुभूति का मार्ग प्रशस्त करता है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि योग और गीता भारतीय संस्कृति के ऐसे दो महान आधार हैं जो मानव जीवन को समग्रता प्रदान करते हैं। योग शरीर को स्वस्थ, मन को एकाग्र और जीवन को संतुलित बनाता है, जबकि गीता जीवन के प्रत्येक संघर्ष में कर्तव्य, धैर्य, विवेक और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करती है। दोनों का समन्वय व्यक्ति को उत्कृष्ट व्यक्तित्व तथा उच्च जीवन-मूल्यों की ओर अग्रसर करता है।
कार्यक्रम का सम्पूर्ण वातावरण योग, अध्यात्म, संस्कृति एवं राष्ट्रचेतना के भावों से ओतप्रोत रहा। उपस्थित प्रतिभागियों ने नियमित योगाभ्यास एवं भारतीय ज्ञानपरम्परा के मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।












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