
रामयश मिश्रा
वाराणसी। नाथों के नाथ भगवान जगन्नाथ के एकांतवास पर जाने (बीमार होने ) की लीला भी मानव को एक संदेश देने के लिए उनके द्वारा ही रची गई हैं ।
भगवान स्वयं बीमार होकर पूरे श्रृष्टि को यह संदेश देते हैं कि इस धरती पर जो भी जीव पैदा होगा उसे दुख सुख का सामना करना ही पड़ेगा। यह जो शरीर मिला है उसमें रोग व्याधि आएंगे ही लेकिन हम उसका मुकाबला धीरज संयम के साथ करेंगे तो वह दूर होगा ।
दुख सुख जीवन का हिस्सा है और यह पृथ्वी पर आने वाले हर जीव को चाहे वह मानव रूप में हो या जीव जंतुओं के रूप में उसे सहना ही पड़ेगा।
संदेश देते हैं कि किसी चीज की अति भी काफी नुकसानदेह होती है।
जेठ माह की पूर्णिमा को भक्तों द्वारा अत्यधिक जल चढ़ाने के कारण भगवान बीमार होकर एक संदेश यह भी देते हैं कि अति हर चीज की नुकसानदायक होती है चाहे किसी रूप में क्यों ना हो। प्रकृति द्वारा मिले हुए जल,वायु व जमीन का हम उतना ही उपयोग करें जितना हमें जरूरत हो। आवश्यकता से अधिक दोहन करने से प्रकृति में असंतुलन हो जाएगा और फिर हमें विनाश से कोई रोक नहीं सकता है। साथ ही भगवान का जो काढ़े का भोग लगता है उसमें भी एक अच्छा संदेश छुपा है कि प्रकृति ही शरीर को स्वस्थ एवं सुंदर रख सकती है प्रकृति द्वारा मिले वस्तुओं का अगर सदुपयोग करें।











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