स्वामी करपात्री जी का ‘मार्क्सवाद और रामराज्य’ भारतीय राजनीतिक दर्शन की अनुपम कृति :-कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा

“करपात्री जी का चिंतन राष्ट्र और धर्म का शाश्वत पथप्रदर्शक” – स्वामी अभिषेक ब्रह्मचारी।

वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संस्कृत विद्या विभाग द्वारा भारतीय ज्ञान-परम्परा के महान मनीषी एवं धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा रचित कालजयी ग्रन्थ ‘मार्क्सवाद और रामराज्य’ की समसामयिक प्रासंगिकता पर केन्द्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं व्याख्यान-विमर्श का भव्य आयोजन विश्वविद्यालय के योगसाधना केन्द्र में सम्पन्न हुआ। संगोष्ठी में देशभर से उपस्थित विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भारतीय एवं पाश्चात्य राजनीतिक दर्शन के तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में स्वामी करपात्री जी के वैचारिक अवदान पर गंभीर एवं सारगर्भित विमर्श किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि ‘मार्क्सवाद और रामराज्य’ केवल मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतिवाद नहीं, बल्कि भारतीय राज्य-दर्शन, सामाजिक समरसता, आर्थिक न्याय तथा धर्माधिष्ठित लोकव्यवस्था का एक प्रामाणिक दार्शनिक घोष है। उन्होंने कहा कि स्वामी करपात्री जी ने भारतीय शास्त्र-परम्परा के आलोक में मार्क्सवाद की मूल अवधारणाओं का तार्किक एवं शास्त्रीय विश्लेषण करते हुए सिद्ध किया कि भारतीय जीवन-दृष्टि का आधार संघर्ष नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, समन्वय, न्याय एवं लोकमंगल है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम सम्पूर्ण मानवता के आदर्श, नीति -निर्देशक एवं धर्म के साक्षात् विग्रह हैं। रामराज्य व्यक्ति की गरिमा, नैतिक उत्तरदायित्व, न्यायपूर्ण शासन तथा ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की भावना पर आधारित आदर्श व्यवस्था का प्रतीक है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी अक्षुण्ण है।

मुख्य अतिथि परमपूज्य स्वामी अभिषेक ब्रह्मचारी जी ने कहा कि धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी का सम्पूर्ण साहित्य भारतीय सनातन ज्ञान-परम्परा का सजीव एवं प्रामाणिक स्वरूप है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन धर्म, मर्यादा, न्याय एवं लोककल्याण का सर्वोच्च आदर्श है और रामराज्य सम्पूर्ण समाज के कल्याण का शाश्वत मॉडल प्रस्तुत करता है। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के ऐतिहासिक महत्व तथा श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पुनर्स्थापन के संकल्प का उल्लेख करते हुए समाज को धर्माधारित राष्ट्रचिंतन अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने करपात्री जी के त्याग, तप, राष्ट्रसमर्पण तथा लोकमंगल के लिए किए गए अविस्मरणीय योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि संत समाज के नैतिक पथप्रदर्शक होते हैं और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका सदैव निर्णायक रही है। उन्होंने युवाओं से भारतीय मनीषियों के मूल ग्रन्थों का अध्ययन कर राष्ट्र और संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित होने का आह्वान किया।

मुख्य वक्ता एवं युवा चेतना के राष्ट्रीय संयोजक श्री रोहित कुमार सिंह ने विषय का विस्तृत विवेचन करते हुए कहा कि स्वामी करपात्री जी ने ‘मार्क्सवाद और रामराज्य’ में मार्क्सवाद के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक पक्षों की भारतीय दृष्टि से सूक्ष्म एवं तथ्यपरक समीक्षा की है। उन्होंने कहा कि समय के साथ मार्क्सवाद का प्रभाव निरंतर क्षीण हुआ है, जबकि रामराज्य की अवधारणा आज भी जनभावनाओं में जीवंत है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने परिवारवाद नहीं, बल्कि योग्यता, न्याय और लोककल्याण को सर्वोच्च स्थान दिया। बाली के पश्चात सुग्रीव तथा रावण के पश्चात विभीषण को राज्य सौंपना उनके आदर्श समाज- दर्शन का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि रामराज्य अनुशासन, संस्कृति, मानव-मूल्यों, नैतिक उत्तरदायित्व और सामाजिक समरसता पर आधारित व्यवस्था है, जबकि वर्ग-संघर्ष एवं राज्य के अत्यधिक नियंत्रण पर आधारित विचार अंततः व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन को प्रभावित करते हैं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में इस ग्रन्थ का पुनर्पाठ भारतीय राजनीतिक चिंतन को नई दिशा प्रदान कर सकता है।

संगोष्ठी के संयोजक डॉ. रविशंकर पाण्डेय ने स्वागत भाषण एवं विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि स्वामी करपात्री जी भारतीय दार्शनिक परम्परा के उन विरल आचार्यों में हैं जिन्होंने शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर आधुनिक विचारधाराओं का गम्भीर परीक्षण किया। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान-परम्परा के पुनर्पाठ, युवा पीढ़ी में मौलिक चिंतन के संवर्धन तथा राष्ट्रकेंद्रित वैचारिक विमर्श को नई ऊर्जा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

वैदिक , पौराणिक मंगलाचरण डॉ विजय कुमार शर्मा ने किया।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में मंगलाचारन के गुंजित स्वर के बीच मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं मां सरस्वती तथा करपात्री जी के तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया।

मंचस्थ अतिथियों का परम्परिक रूप से कुलपति ने स्वागत और अभिनंदन किया।

सामूहिक राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी सम्पन्न हुई।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. जितेन्द्र कुमार, छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष प्रो. शैलेश कुमार मिश्र, प्रो. राजनाथ, प्रो. विद्या कुमारी चंद्रा, डॉ विजय कुमार शर्मा, डॉ जितेन्द्र धर द्विवेदी सहित विश्वविद्यालय के अनेक आचार्य, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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