
वाराणसी ।अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी द्वारा *“आचार्यत्व: प्रज्ञा में प्रतिष्ठित”* विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. राजा पाठक, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई द्वारा मंगलाचरण से हुई। इसके उपरांत दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, कुलपति, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी ने की। प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान) आईयूसीटीई, वाराणसी ने स्वागत उद्बोधन किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर शिक्षक सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया। जिसमें प्रो. मधुलिका अग्रवाल, वनस्पति विज्ञान विभाग, बीएचयू, वाराणसी, प्रो. कल्पलता पाण्डेय, पूर्व कुलपति, जे.एन.सी.यू., बलिया, उत्तर प्रदेश, तथा श्री गोविंद बाबा जी को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ‘प्रैक्टिस टू पॉलिसी: केस स्टडीज़ ऑन एनईपी 2020’ नामक पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया, जिसके प्रमुख संपादक प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई एवं संपादक प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डॉ. अजय कुमार सिंह एवं दीप्ति गुप्ता हैं।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि पिछले सौ वर्षों से हम सभी के लिए शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहे हैं। ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि इस व्यापक शैक्षिक लक्ष्य में ‘आचार्यत्व’ की अवधारणा किस प्रकार और कहाँ प्रभावी रूप से समाहित हो सकती है। उन्होंने कहा कि आचार्यत्व को प्रत्येक उपयुक्त स्थान पर, जहाँ वास्तव में इसकी आवश्यकता हो, सार्थक रूप से जोड़ा जाना चाहिए। इसे अनावश्यक रूप से या केवल औपचारिकता के लिए कहीं भी समाहित करने की आवश्यकता नहीं है। आचार्यत्व का उद्देश्य तभी सार्थक होगा, जब इसका समुचित उपयोग करते हुए अधिक से अधिक लोग इसके लाभ से परिचित और लाभान्वित हो सकें। प्रो. मधूलिका अग्रवाल ने कहा कि सीखना आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है और शिक्षक एवं विद्यार्थी दोनों के लिए मूल्यांकन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। प्रो. कल्पलता पाण्डेय ने आचार्य के पारंपरिक गुणों को आत्मसात करने पर बल देते हुए कहा कि परिवर्तनकारी शिक्षक ही एक श्रेष्ठ शिक्षक की पहचान है। प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में आचार्यत्व की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दर्शन के अनुसार स्थिर बुद्धि, दोषरहित दृष्टि, शुद्ध आचरण तथा सत्य और संतुलित जीवन में ही आचार्यत्व की सार्थकता निहित है। उन्होंने आचार्यत्व को शिक्षक एवं विद्यार्थी के बीच ज्ञान, मूल्य और संस्कारों के सशक्त सेतु के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
द्वितीय सत्र में प्रो. पवन कुमार शर्मा, राजनीति विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ने विशिष्ट व्याख्यान प्रस्तुत किया। उनके व्याख्यान का विषय “द आचार्याज़ रोल इन द एज ऑफ एआई: कल्टिवेटिंग एम्पैथी, एथिक्स, एंड ह्यूमन कनेक्शन” रहा। उन्होंने कहा कि आचार्यत्व शब्द ‘आचरण’ से बना है और शिक्षक शिक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा में नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों का समुचित समावेश नहीं होगा, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। उन्होंने एनईपी-2020 में भारतीय ज्ञान परम्परा के समावेशन एवं उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी विशेष बल दिया। तृतीय सत्र में शोध-पत्र प्रस्तुतिकरण आयोजित किया गया। इसमें प्रतिभागियों ने संगोष्ठी के केंद्रीय विषय आचार्यत्व से संबंधित विभिन्न विषयों पर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इस सत्र के माध्यम से विषय के विविध अकादमिक आयामों पर विचारों के आदान-प्रदान तथा सार्थक शोधपरक संवाद को आगे बढ़ाया गया।
इस अवसर पर पुस्तकालयाध्यक्ष श्री सी. डी. राणा के नेतृत्व में एक भव्य पुस्तक मेले का भी आयोजन किया जा रहा है। इस संगोष्ठी में 10 राज्यों से 50 से अधिक प्रतिभागी सहभागिता कर रहे हैं। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई तथा डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई द्वारा किया जा रहा है।

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