अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

वाराणसी।अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी में “भारतीय ज्ञान परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठा” विषय पर द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के प्रथम दिवस का शुभारंभ हुआ।

 

 

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा भारत माता एवं माँ सरस्वती के चित्रों पर पुष्पार्चन कर किया गया। कार्यशाला का आयोजन व्याख्यान कक्ष, भूतल में किया गया।

 

प्रथम दिवस के कार्यक्रम में कुल चार सत्रों का आयोजन हुआ, जिनमें शिक्षा से जुड़े विविध विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।

 

कार्यक्रम का उद्घाटन सत्र (सत्र-1), जिसका विषय “वर्तमान शिक्षा की चुनौतियाँ तथा समाधान हेतु हमारी भूमिका” रहा। सत्र के स्वागत वक्तव्य एवं विषय स्थापना करते हुए प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने इस ओर संकेत किया कि भारत में भारतीय ज्ञान परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठा की आवश्यकता क्यों अनुभव की जा रही है।

 

उन्होंने इस संदर्भ में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित कराते हुए कहा कि भारत ने ज्ञान को कभी खोया नहीं है, बल्कि उसे देखने की दृष्टि अवश्य खो दी है, यही कारण है कि आज इसकी पुनर्प्रतिष्ठा आवश्यक हो गई है।

 

इसके पश्चात मुख्य वक्ता श्री डी. रामकृष्ण राव, पूर्व प्राचार्य, विज्ञान विहार, विशाखापत्तनम तथा सदस्य, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एन.सी.टी.ई.) ने अपने संबोधन में कहा कि इस कार्य में हमें मुख्यतः दो प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है—प्रथम, मूलभूत चुनौतियाँ, तथा द्वितीय, वर्तमान शैक्षिक जगत की चुनौतियाँ।

 

उन्होंने बल देते हुए कहा कि हमें मुख्य रूप से मूलभूत चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि चुनौतियों को स्वयं स्वीकार करना होगा और उनका समाधान भी स्वयं ही खोजना होगा। इसके साथ ही उन्होंने इस प्रक्रिया में विद्वत परिषद की भूमिका को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।

 

सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में स्वस्थ संस्कार, आत्मबोध एवं आचार्य की विशेषताओं से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला। सत्र का संचालन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी द्वारा तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रदीप जायसवाल द्वारा किया गया।

द्वितीय सत्र का विषय “भारतीय शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति में शिक्षा संस्थानों/हितधारकों की भूमिका” रहा। इस सत्र में श्री गोबिंद चंद्र महंत, अखिल भारतीय संगठन मंत्री, विद्या भारती ने वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थान केवल ज्ञान प्रदान करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज एवं राष्ट्र निर्माण के उत्तरदायी हितधारक भी हैं, और भारतीय शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति तभी संभव है जब सभी हितधारक मिलकर समन्वित प्रयास करें।

 

सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. बिहारी लाल शर्मा, कुलपति, सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि शिक्षा संस्थानों को केवल औपचारिक ज्ञान के केंद्र न रहकर समाज के प्रति अपनी जवाबदेही को भी समझना होगा।

 

उन्होंने यह भी कहा कि जब तक शिक्षक, अभिभावक एवं प्रशासनिक तंत्र जैसे सभी हितधारक एकजुट होकर कार्य नहीं करेंगे, तब तक शैक्षिक लक्ष्यों की वास्तविक प्राप्ति संभव नहीं होगी। सत्र का संचालन डॉ. कुशाग्री सिंह ने किया।

तृतीय सत्र का विषय “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के क्रियान्वयन में हमारी भूमिका” रहा। इस सत्र को प्रो. आशीष श्रीवास्तव, संकाय प्रमुख, शैक्षणिक व शोध ने संबोधित किया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा करते हुए बताया कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए शिक्षकों, संस्थानों और नीति-निर्माताओं को समान रूप से अपनी भूमिका निभानी होगी, तभी नीति के लक्ष्य वास्तविक रूप से धरातल पर साकार हो सकेंगे। अध्यक्षता करते हुए श्री डी. रामकृष्ण राव, सदस्य, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद, नई दिल्ली ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का सफल क्रियान्वयन तभी संभव है जब इसे केवल दस्तावेज़ तक सीमित न रखकर कक्षा-स्तर की वास्तविक शिक्षण प्रक्रिया में उतारा जाए।

 

उन्होंने यह भी कहा कि इस नीति की मूल भावना को साकार करने के लिए शिक्षक समुदाय को सक्रिय एवं उत्तरदायी भूमिका निभानी होगी। सत्र का संचालन डॉ. कुशाग्री सिंह द्वारा किया गया।

प्रथम दिवस का समापन सामूहिक चर्चा पर आधारित चतुर्थ सत्र (सत्र-4) के साथ हुआ। इस सत्र का विषय स्वयं कार्यशाला की मूल संकल्पना “भारतीय ज्ञान परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठा” रहा। चर्चा का नेतृत्व करते हुए श्री अवनीश भटनागर, अखिल भारतीय उपाध्यक्ष, विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, नई दिल्ली ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा सदियों से मानवता को दिशा देती रही है और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में इसके मूल्यों को पुनः स्थापित करना समय की माँग है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परम्परा के समन्वय से ही एक समग्र एवं सशक्त शिक्षा प्रणाली का निर्माण संभव हो सकेगा। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी, कुलपति, केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, वाराणसी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा विविध सांस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपराओं का संगम है, जिसे संरक्षित एवं पुनर्जीवित करना वर्तमान पीढ़ी का उत्तरदायित्व है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठा से शिक्षा में मूल्यपरकता एवं सांस्कृतिक चेतना का संचार होगा, जो राष्ट्र निर्माण की दिशा में अत्यंत आवश्यक है। सत्र का संचालन डॉ. राजा पाठक द्वारा किया गया।

कार्यशाला के प्रथम दिवस में संस्थान के समस्त अधिकारीगण, शिक्षकगण एवं कर्मचारीगण की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। प्रथम दिवस का समापन वन्दे मातरम् के साथ हुआ। कार्यशाला का द्वितीय एवं समापन दिवस 25 अक्टूबर 2026 को आयोजित होगा।

 

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