आईयूसीटीई में आठ दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ

 

 

वाराणसी । सोमवार को ‘एम्पावरिंग एजुकेटर्स इन द ग्लोबल साउथ’ विषय पर आठ दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी परिसर में हुआ।

यह कार्यक्रम यूनेस्को एमजीआईईपी,नई दिल्ली और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग कार्यक्रम, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र की शुरुआत मंगलाचरण, मां सरस्वती की प्रतिमा और महामना मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद दीप प्रज्वलन से हुई।

यह कार्यक्रम दो मुख्य क्षेत्रों- ‘प्रारंभिक बाल्यकाल देखभाल एवं शिक्षा के लिए सामाजिक और भावनात्मक अधिगम’, जो 3-8 वर्ष के बच्चों के साथ काम करने वाले शिक्षकों के लिए है, और ‘डिजिटल शिक्षक: डिजिटल शिक्षणशास्त्र की एक आधारशिला’, जिसका उद्देश्य प्रतिभागियों को डिजिटल शिक्षण कौशल से सशक्त बनाना है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. सत्यजीत प्रधान, निदेशक, महामना कैंसर सेंटर, वाराणसी रहे।उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, बीएचयू ने किया। इस अवसर पर यूनेस्को एमजीआईईपी, नई दिल्ली के निदेशक डॉ. ओबिजियोफोर अगिनम भी उपस्थित रहे। आईयूसीटीई के डीन (शैक्षणिक एवं शोध), प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने सभी गणमान्य अतिथियों और विश्वभर से आए प्रतिभागियों का स्वागत किया। डॉ. नंदिनी चटर्जी ने कार्यक्रम के उद्देश्यों और उसकी संरचना की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इसकी महत्ता को रेखांकित किया।

मुख्य अतिथि प्रो. सत्यजीत प्रधान ने अपने संबोधन में बच्चों के जीवन में दो महत्वपूर्ण व्यक्तियों- माँ और शिक्षक की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि माँ बच्चे को स्कूल तक पहुँचाती है, जबकि शिक्षक उसके जीवन को संवारने का कार्य करता है। उन्होंने ज़ोर दिया कि समाज की आवश्यकताएँ विकसित देशों से भिन्न होती हैं और हमारे संसाधन सीमित हैं। इसलिए गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा के लिए अच्छे शिक्षकों की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यूनेस्को, एमजीआईईपी, नई दिल्ली के निदेशक डॉ. ओबिजियोफोर अगिनम ने शिक्षा की सतत परिवर्तनशील प्रकृति पर बल दिया और ग्लोबल साउथ के शिक्षकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने सामाजिक और भावनात्मक अधिगम तथा डिजिटल शिक्षण शास्त्र जैसे उभरते शैक्षिक क्षेत्रों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम शिक्षकों को आधुनिक शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सहायक होते हैं।

नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नेल्सन मंडेला के शब्दों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम विशेष रूप से ग्लोबल साउथ में शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है जहां विशिष्ट चुनौतियां और अवसर मौजूद हैं। उन्होंने ज़ोर दिया कि शिक्षा प्रणाली को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने के लिए ग्लोबल साउथ की ज़रूरतों और दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

आईयूसीटीई, वाराणसी के निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि आज के तेज़ी से बदलते विश्व में अनुकूलनशीलता आवश्यक है। उन्होंने बताया कि हम जिस परिवेश में रहते हैं, वह निरंतर परिवर्तनशील है और हमारी शिक्षण विधियां भी इस बदलाव के साथ विकसित होनी चाहिए। उन्होंने पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों की सीमाओं को उजागर करते हुए डिजिटल तकनीकों के उपयोग की अनिवार्यता पर ज़ोर दिया और कहा कि तकनीकी-सक्षम शिक्षण अब प्रभावी अधिगम के लिए अपरिहार्य हो गया है।

प्रो. सिंह ने इस बात को रेखांकित किया कि शिक्षा सूचना देने तक सीमित नहीं बल्कि यह समग्र रूप से एक बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि चरित्र निर्माण बच्चे के विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है और शिक्षकों की यह जिम्मेदारी है कि वे इस विकास को पोषित करें। उन्होंने आईयूसीटीई की शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन लाने की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि हम उन्नत शिक्षायुक्त शिक्षक बनाने के लिए संकल्पबद्ध हैं, और यह कार्यक्रम उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

उद्घाटन सत्र के बाद प्रतिभागियों के लिए दो सत्र आयोजित किए गए। पहला सत्र ‘हम कैसे सीखते हैं?’ था, जो अधिगम प्रक्रियाओं पर केंद्रित था, जबकि दूसरा सत्र ‘कला: एक अप्रत्याशित आगंतुक’ था, जिसमें कला को एक अद्वितीय दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया गया। दोनों सत्रों ने शिक्षकों को अंतर्दृष्टिपूर्ण और प्रेरणादायक चर्चाओं से जोड़ने का कार्य किया।

इस कार्यक्रम का समन्वय आईयूसीटीई के कार्यक्रम निदेशक, प्रो. आशीष श्रीवास्तव द्वारा किया जा रहा है, जबकि यूनेस्को, एमजीआईईपी, नई दिल्ली की ओर से श्रीमती अर्चना चौधरी, राष्ट्रीय परियोजना अधिकारी के रूप में कार्यक्रम का संचालन कर रही हैं। डॉ. कुशाग्री सिंह ने कार्यक्रम का संचालन व डॉ. राजा पाठक ने मंगलाचरण किया।

इस कार्यक्रम में 19 देशों से 60 शिक्षक भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम के अंत में प्रो. अजय सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में डॉ. विनोद सिंह, डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी, तथा अन्य महत्वपूर्ण गणमान्य व्यक्तियों और संकाय सदस्यों सहित केंद्र के सभी अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *