वाराणसी। अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान- दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) और अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र (सिप) ने आज गुरुवार को वाराणसी में एक संयुक्त बहु-हितधारक बैठक का आयोजन किया। इस बैठक का उद्देश्य एक नई मशीनरी नवाचार का मूल्यांकन करना था, जिसे ‘पोटैटो ज़ीरो टिलेज विद राइस स्ट्रॉ मल्च (PZTM)’ नामक तकनीक को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया है। यह तकनीक चावल–आलू की फसल प्रणाली को अधिक टिकाऊ, जलवायु-लअनुकूलऔर संसाधन-कुशल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

बैठक में सरकारी अधिकारी, सीजीआईएआर केंद्रों के प्रतिनिधि, एग्री-टेक कंपनियां, फूड प्रोसेसिंग कंपनियां, विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता और किसान संगठनों के सदस्य शामिल हुए। चर्चा के केंद्र में कॉम्बाइन हार्वेस्टर का एक नया प्रोटोटाइप था, जिसे ज़ीरो-टिल आलू-प्लांटर के साथ जोड़ा गया है। यह मशीन एक ही बार में धान की कटाई के बाद बचे भूसे को संभालते हुए उसी खेत में आलू की बुवाई कर सकती है।

यह पहल कृषि प्रणाली-आधारित यंत्रीकरण की ज़रूरत को सामने लाती है, जो फसल विविधीकरण, जलवायु-अनुकूल खेती, फसल अवशेषों के उपयोग और छोटे किसानों के लिए समावेशी नवाचार जैसे जटिल मुद्दों को ध्यान में रखती है।

PZTM तकनीक क्या है?

इस तकनीक के ज़रिए आलू की बुवाई धान की कटाई के बाद सीधे खेत में मौजूद भूसे का उपयोग कर की जा सकती है। यह भूसा खेत में प्राकृतिक मल्च का काम करता है और गहरी जुताई की ज़रूरत नहीं पड़ती। इससे मिट्टी की सेहत बेहतर होती है, नमी बनी रहती है, सिंचाई और खाद की ज़रूरत घटती है, और मज़दूरी का खर्च भी कम हो जाता है।

सामान्यत: जब मशीन से धान की कटाई होती है, तब खेत में भूसा और ठूंठ रह जाते हैं, जो पारंपरिक तरीके से आलू लगाने में बाधा बनते हैं। यह नया प्रोटोटाइप इस समस्या को हल करता है, और धान की कटाई के तुरंत बाद ही उसी प्रक्रिया में आलू की बुवाई कर सकता है।

उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है और धान उत्पादन में भी अग्रणी है, इस तकनीक को लागू करने के लिए एक उपयुक्त क्षेत्र बन गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार के उद्यान विभाग की ओर से श्री बी.एल. मीणा, अपर मुख्य सचिव (उद्यान), ने इस बैठक में भाग लिया। उन्होंने कहा कि ऐसे नवाचारों को राज्य की मौजूदा योजनाओं से जोड़कर बड़े स्तर पर लागू किए जाने की आवश्यकता है। डॉ. सुधांशु सिंह, निदेशक, आइसार्क ने कहा, “उत्तर प्रदेश में अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र (सिप) के साउथ एशिया रीजनल सेंटर का होना एक अच्छा संकेत है। इससे दोनों संस्थानों के प्रयासों में तालमेल बढ़ेगा, जो राज्य की कृषि प्रणाली के लिए लाभकारी है। आज की यह बैठक अनोखी है क्योंकि इसमें किसानों की भागीदारी से मशीन के डिज़ाइन की समीक्षा की जा रही है। यह नई मशीन अगर लागू हो जाए तो पूर्वी भारत में चावल–आलू प्रणाली में समय की बचत, संसाधनों का संरक्षण और फसल चक्र में सुधार संभव हो पाएगा।”

डॉ. नीरज शर्मा, कंट्री हेड, सिप, ने कहा कि आलू की खेती में महिलाएं बड़ी भूमिका निभाती हैं और अब समय आ गया है कि कठिन श्रम को आसान और समयबद्ध बनाने के लिए यंत्रीकरण को बढ़ावा दिया जाए। उन्होंने बताया कि पंजाब जैसे राज्य में पहले से अच्छी मशीनें हैं, लेकिन बिहार जैसे राज्य में अभी शुरुआत हो रही है। इसीलिए किसानों, मशीन कंपनियों और शोध संस्थानों के बीच सहयोग ज़रूरी है। उन्होंने मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, अवशेष जलाने की समस्या के समाधान और महिला किसानों की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया।

यह पहल आइसार्क और सिप के पिछले सहयोग – जैसे असम में अपार्ट प्रोजेक्ट – पर आधारित है, जहां ज़ीरो-टिल आलू की खेती से पर्यावरण और पैदावार दोनों में सुधार देखा गया। इस बैठक में आइसार्क और सिप के वैज्ञानिकों के अलावा पेप्सिको, मैक्केन, यांमार, खालसा जैसी कृषि मशीनरी कंपनियों, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं, और कई राज्यों के किसानों ने भाग लिया।

चर्चा में मुख्य रूप से मशीन के डिज़ाइन की व्यावहारिकता पर विचार किया गया; यह देखा गया कि खेत की वास्तविक परिस्थितियों में यह मशीन किस हद तक कारगर होगी। इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों की जलवायु, मिट्टी और खेती की पद्धतियों को ध्यान में रखते हुए यह मूल्यांकन किया गया कि यह तकनीक किन क्षेत्रों में सबसे उपयुक्त रहेगी। फील्ड परीक्षण की समयसीमा को लेकर भी विचार-विमर्श हुआ, ताकि तय समय में इसका प्रयोग कर परिणामों का आकलन किया जा सके। अंत में, इस मशीन को बड़े स्तर पर किसानों तक पहुँचाने की योजना और उसके लिए आवश्यक संसाधनों व रणनीति पर चर्चा की गई।

राज्यवार समूह-चर्चाओं के ज़रिए उत्तर प्रदेश, ओडिशा, गुजरात, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों में पायलट जिलों की पहचान की गई। साथ ही, लैंगिक समावेशन, मज़दूरों की कमी और फील्ड स्तर पर प्रशिक्षण की ज़रूरत को भी रेखांकित किया गया।

आगे की कार्ययोजना पर सहमति बनी:

मशीन के डिज़ाइन में फील्ड से मिले सुझावों के अनुसार सुधार किया जाएगा। पूर्वी और उत्तरी भारत के कुछ जिलों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू होंगे। परीक्षण के लिए सार्वजनिक, निजी और शोध संस्थानों की संयुक्त कार्य योजना तैयार की जाएगी। MIDH, RKVY और राज्य सरकार की योजनाओं से जुड़ने के अवसरों को तलाशा जाएगा। यह प्रोटोटाइप आगामी रबी सीज़न में फील्ड में परीक्षण के लिए तैयार रहेगा, जिसे आइसार्क और सिप मिलकर लागू करेंगे। एक साझी रणनीति बनाई जा रही है, जिससे इसे राष्ट्रीय और राज्य स्तर की प्राथमिकताओं से जोड़ा जा सके, और किसान-प्रेरित नवाचार को बढ़ावा दिया जा सके।

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