वाराणसी | माहवारी से जुड़ी सामाजिक चुप्पी को तोड़ते हुए किशोरियों एवं महिलाओं को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से जुलाई माह में सोशल एक्शन एंड रिसर्च सेंटर – सार्क, मिलान फाउंडेशन, तथा प्रोजेक्ट बाला के संयुक्त तत्वावधान में माहवारी स्वच्छता अभियान और संगोष्ठी सम्पन्न हुआ।

यह आयोजन वाराणसी के मुख्य तीन स्थान आशापुर, शिवाजी मिशन स्कूल और तिलमापुर गवर्नमेंट स्कूल में आयोजित रहा। उस आयोजन में जिसमें बड़ी संख्या में किशोरियों और महिलाओं ने प्रतिभाग किया।

इस अभियान का उद्देश्य माहवारी जैसे स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियों को समाप्त करना, बालिकाओं को सही जानकारी देना, स्वच्छता के वैज्ञानिक तरीकों से अवगत कराना और उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था।

संगोष्ठी की शुरुआत संवादात्मक ढंग से की गई, जिसमें प्रशिक्षकों ने बालिकाओं से खुलकर बातचीत की, उनकी जिज्ञासाओं को सुना और सहज तरीके से समाधान भी प्रस्तुत किया।

आयोजन में भाग लेने वाली लड़कियों को बताया गया कि माहवारी एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है, जिसे न शर्म से दबाना चाहिए और न ही अज्ञानता के कारण डरना चाहिए। प्रशिक्षण में माहवारी के दौरान स्वच्छता बनाए रखने के तरीके, उचित पोषण, पुनः उपयोग योग्य सैनिटरी पैड्स के प्रयोग और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के सुझाव दिए गए।

विशेष रूप से यह बताया गया कि पुनः उपयोग योग्य पैड्स न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी हैं।

लड़कियों को यह भी सिखाया गया कि इन पैड्स को कैसे सही तरीके से धोया जाए, सुखाया जाए और फिर से इस्तेमाल किया जाए।

संगोष्ठी के दौरान छात्राओं ने न केवल पूरी उत्सुकता से भाग लिया बल्कि अपने अनुभव भी साझा किए।

ंएक छात्रा ने कहा, “पहले हमें यह सब बोलने में डर और शर्म आती थी, लेकिन अब हम समझ चुके हैं कि इसपर बात करना बहुत जरुरी है है। अब हम अपने अनुभवों को बिना संकोच व्यक्त कर सकते हैं।” इस प्रकार की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि यह अभियान केवल जानकारी देने का जरिया नहीं रहा, बल्कि इसने लड़कियों को आत्मविश्वास देने का कार्य भी किया।

मिलान फाउंडेशन की प्रशिक्षित टीम ने मासिक धर्म के दौरान मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने, स्कूल में उपस्थित रहने और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने के संदेश भी दिए। उन्होंने यह भी बताया कि सही जानकारी और खुले संवाद के ज़रिए हम लड़कियों को सशक्त बना सकते हैं। प्रोजेक्ट बाला की ओर से पुनः उपयोग योग्य सैनिटरी नैपकिन वितरित किए गए, जिनका उपयोग आने वाले महीनों तक किया जा सकता है। ये पैड्स कपड़े से बने होते हैं, जिन्हें साफ-सुथरे ढंग से धोकर बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे पर्यावरणीय अपशिष्ट भी कम होता है।

तिलमापुर के गवर्नमेंट स्कूल की एक शिक्षिका ने बताया कि “पहली बार इस तरह का सत्र स्कूल में आयोजित हुआ, जहाँ छात्राएँ खुलकर सवाल पूछ रही थीं। यह बदलाव शिक्षा की दिशा में भी एक सकारात्मक संकेत है।”

शिवाजी मिशन स्कूल के प्राचार्य ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि “ऐसे आयोजन हमारे समाज को जड़ से बदलने का सामर्थ्य रखते हैं, क्योंकि वे भविष्य की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर करते हैं।”

इस अभियान में खास बात यह रही कि इसमें केवल छात्राओं को ही नहीं, बल्कि आस-पास की महिलाओं को भी आमंत्रित किया गया था, ताकि यह संदेश सिर्फ स्कूलों तक सीमित न रहे बल्कि समुदाय के बीच भी फैले। आशापुर की एक महिला प्रतिभागी ने कहा कि “पहली बार किसी ने गाँव में आकर हमें यह बताया कि मासिक धर्म कोई अभिशाप नहीं है, बल्कि यह एक सामान्य और जरूरी प्रक्रिया है।

“संगोष्ठी का संचालन मिलान फाउंडेशन और Social Action and Research Centre की अनुभवी टीमों ने किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी लड़की अपनी बात कहने से हिचके नहीं। सभी सत्र इतने सहज और संवादात्मक थे कि लड़कियाँ लगातार भागीदारी करती रहीं। आयोजकों ने पोस्टर, चार्ट और पैड्स के मॉडल की मदद से प्रैक्टिकल डेमो भी दिए ताकि बातें केवल सिद्धांत तक सीमित न रहें, बल्कि व्यवहारिक भी बनें।

इस कार्यक्रम की सफलता इसी बात से मापी जा सकती है कि लड़कियां स्वयं आगे आकर अपने अनुभव बांट रही थीं और मासिक धर्म को लेकर उनमें जागरूकता और आत्मगौरव की भावना स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उन्होंने न केवल सीखने की रुचि दिखाई, बल्कि आने वाले समय में इस जानकारी को दूसरों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ली।

यह पूरी पहल समाज में एक सकारात्मक सोच लाने का प्रयास है, जहां मासिक धर्म को वर्जना नहीं बल्कि गर्व से जुड़ी एक जैविक प्रक्रिया के रूप में देखा जाए। जब लड़कियां अपनी शारीरिक प्रक्रियाओं को समझेंगी, उन्हें अपनाएंगी और खुलकर बात करेंगी, तभी वे सही मायनों में सशक्त कहलाएंगी। इस तरह के जागरूकता कार्यक्रम न केवल जानकारी देते हैं, बल्कि समाज में बदलाव की नींव रखते हैं।

इस अभियान की योजना आगे भी अन्य क्षेत्रों में लागू करने की है, ताकि हर गांव, हर स्कूल, और हर लड़की तक यह संदेश पहुंचे – कि मासिक धर्म पर बात करना ज़रूरी है, जरूरी नहीं कि यह बात चुपचाप सह ली जाए। मिलान फाउंडेशन, प्रोजेक्ट बाला और SARC का यह संयुक्त प्रयास समाज को एक नई दिशा देने का कार्य कर रहा है -एक ऐसी दिशा, जहां हर लड़की बिना शर्म, बिना डर, और पूरी समझदारी से अपना जीवन जिए।

इस कार्यक्रम में प्रशिक्षक के रूप में रंजना गौर, जमुना शुक्ल तथा निधिकुमार मुख्य थी। ब्लॉक चिरईगांव वाराणसी की एकेडमिक रिसोर्स पर्सन विज्ञान की रश्मि त्रिपाठी भी उपस्थित विशिष्ट रूप में थी।कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन अध्यापिका ऋचा सिंह ने किया ।

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