हिंदी गद्य के उन्नायक राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं हिंदी निबंध के शीर्ष आचार्य राम चंद्र शुक्ल से संबंधित संगोष्ठी 

 

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय अर्दली बाजार (एलटी कालेज) में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत हिंदी गद्य के उन्नायक राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं हिंदी निबंध के शीर्ष आचार्य राम चंद्र शुक्ल से संबंधित संगोष्ठी आयोजित की गई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समग्र योगदान को रेखांकित करते हुए मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विवि दिल्ली के हिन्दी एवं भारतीय भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के पहले गंभीर और व्यवस्थित आलोचक हैं। उनकी आलोचना का दायरा व्यापक है। हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के विस्तृत अध्ययन और विवेचन से उनका समीक्षा साहित्य विकसित हुआ है। बीएचयू हिन्दी विभाग के प्रोफेसर प्रभाकर सिंह ने शिवप्रसाद सितारे हिन्द के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द:भाषा चिंतन और इतिहास दृष्टि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में और हिन्दी नवजागरण के चिंतक और लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द भाषा और इतिहास संबधी अपने चिंतन के लिए जितना जाने गये, उससे अधिक हिन्दी-उर्दू विवाद के लिए चर्चित रहे। अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध कथा लेखिका डा. मुक्ता ने कहा कि प्रारंभिक खड़ी बोली हिंदी के विकास एवं देवनागरी लिपि के अस्तित्व के संघर्ष में राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद का महत्वपूर्ण योगदान है। स्वागत भाषण करते हुए डा दयानिधि मिश्र ने हिंदी की धरोहर: काशी की सृजन परंपरा के महत्व को बताते हुए विषय पर प्रकाश डाला। संचालन डाक्टर शुभ्रा श्रीवास्तव, धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र और सरस्वती वंदना मंजरी पाण्डेय ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर राम सुधार सिंह, प्रोफेसर इंदीवर, डाक्टर सुरेन्द्र प्रताप ने भी विचार व्यक्त किया।इस अवसर पर दीपेश चौधरी, अशोक सिंह, इशरत जहां, मंजरी पाण्डेय,कवीन्द्र नारायण आदि थे।

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