वाराणसी।सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के भारतीय ज्ञान परम्परा केन्द्र द्वारा “काश्या न्यायदर्शनपरम्पराया उद्भवो विकासश्च” विषयक ऑनलाइन व्याख्यानमाला का आयोजन प्रो. रामपूजन पाण्डेय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।

यह आयोजन भारतीय ज्ञान परम्परा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में काशी की न्याय-वैशेषिक परम्परा के उद्भव, विकास एवं दार्शनिक महत्त्व को रेखांकित करने हेतु किया गया।

मुख्य वक्ता डॉ. मुनीश कुमार मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में ‘आन्वीक्षिकी’ (न्याय-दर्शन) को समस्त विद्याओं का प्रदीप माना गया है। काशी को महर्षि कणाद की तपःभूमि बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय-वैशेषिक दर्शन केवल तर्कपद्धति नहीं, बल्कि साधना, आत्मबोध और धर्मसंरक्षण से समन्वित दिव्य विद्या है। “न धनेन न धान्येन त्यजते कदाचन” उक्ति के माध्यम से काशी की तात्त्विक परम्परा की आध्यात्मिक आधारभूमि को रेखांकित किया गया।

देवीपुराण (शुम्भ-निशुम्भ प्रसंग) का उल्लेख करते हुए वक्ता ने प्रतिपादित किया कि भगवान शिव ने महर्षि गौतम को ‘आन्वीक्षिकी’ विद्या का उपदेश प्रदान किया—

“साधु गौतम भद्रं ते तर्केषु कुशलो स्यसि…”

तथा शिवकृपा से गौतम द्वारा इस विद्या के पृथ्वी पर प्रचार का वर्णन—

“शम्भोः कृपामनुप्राप्य… विद्या प्रावर्तयत् क्षितौ॥”

न्याय के ‘षोडश पदार्थों’ का संकेत नन्दी द्वारा प्रकट किए जाने और गौतम के ‘अक्षपाद’ नाम की उत्पत्ति—

“पादेऽक्षि स्फोटयामास सोऽक्षपादोऽभवत्ततः।”

का भी उल्लेख किया गया।

उपसंहार में ‘न्यायभाष्य’ का प्रसिद्ध वचन—

“प्रदीपः सर्वविद्यानाम् उपायः सर्वकर्मणाम्।

आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षिकी मता॥”

उद्धृत करते हुए वक्ता ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में न्याय-दर्शन वह प्रदीप है, जिसने भारतीय चिन्तन को तार्किक अनुशासन, बौद्धिक स्पष्टता एवं धर्मसंरक्षण का सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। काशी की यह परम्परा आज भी भारतीय ज्ञान-संरचना की जीवन्त धारा के रूप में प्रवहमान है।

प्रश्नोत्तर सत्र में विद्वानों एवं शोधार्थियों ने न्याय, वैशेषिक तथा पुराणोक्त परम्पराओं के अन्तर्सम्बन्धों पर गम्भीर जिज्ञासाएँ प्रस्तुत कीं। अंत में डॉ. आशीष मणि त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए आशा व्यक्त की कि ऐसी व्याख्यानमालाएँ भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनरुत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी। कार्यक्रम में प्रो. रामपूजन पाण्डेय, डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा, डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. विजय कुमार शर्मा, डॉ. दुर्गेश कुमार पाठक सहित आचार्यगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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