
वाराणसी।बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (BAPS)स्वामीनारायण संस्था के शोध विभाग के प्रमुख, प्रख्यात सन्त एवं संस्कृतके मर्मज्ञ विद्वान स्वामी भद्रेश दास ने बुधवार को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयके कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा से सौहार्दपूर्ण शिष्टाचार भेंट कर भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत शिक्षा तथा प्राचीन शास्त्रों के संरक्षण एवं संवर्धन के विविध आयामों पर गहन विचार-विमर्श किया।
इस अवसर पर स्वामी भद्रेशदास जी ने कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय संस्कृति की मूल चेतना से जुड़ा प्राच्य विद्या का एक विश्वविख्यात केंद्र है, जहाँ वेद, दर्शन, न्याय, व्याकरण, ज्योतिष, साहित्य तथा वैदिक विषयों के मूल शास्त्रों का परम्परागत एवं शास्त्रीय अध्ययन-पाठन आज भी जीवन्त रूप में संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा कि यदि इस विश्वविद्यालय का समुचित एवं योजनाबद्ध विकास किया जाता है, तो इससे सम्बद्ध पारम्परिक संस्कृत पाठशालाओं के सुदृढ़ीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा को राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर नई ऊर्जा प्राप्त होगी।
स्वामी जी ने यह भी कहा कि यह संस्थान केवल शिक्षा का केन्द्र नहीं, बल्कि प्राच्य विद्या का एक जीवंत धाम है, जहाँ भारतीय ज्ञान परम्परा अपने मूल एवं शुद्ध स्वरूप में संरक्षित एवं प्रवाहित हो रही है। उन्होंने संस्कृत भाषा, दर्शन शास्त्र, न्याय शास्त्र, व्याकरण तथा साहित्य के गहन अध्ययन को वैश्विक स्तर पर और अधिक विस्तार देने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संस्थान से जुड़े विद्वानों एवं विद्यार्थियों में एकता, समर्पण और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी निष्ठा का भाव विद्यमान है। साथ ही उन्होंने यह अपेक्षा व्यक्त की कि वैदिक सनातन परंपरा तथा भगवान स्वामीनारायण के आध्यात्मिक दर्शन से सम्बन्धित अध्ययन एवं विमर्श भी विश्वविद्यालय के शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में और अधिक सशक्त रूप से समाहित हों, जिससे इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा और अधिक सुदृढ़ हो सके।
इस अवसर पर कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि यह विश्वविद्यालय भारतीय संस्कृति, दर्शन एवं प्राच्य विद्या के संरक्षण और संवर्धन का एक सशक्त एवं समर्पित केन्द्र है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय से जुड़े सभी विद्वानों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का लक्ष्य भारतीय ज्ञान परम्परा का संरक्षण, संवर्धन एवं उसका वैश्विक विस्तार करना है।
कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि भारतीयता की रक्षा तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण हेतु समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर समन्वित कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय ज्ञान परम्परा के माध्यम से विश्वशान्ति एवं मानवीय मूल्यों के पुनर्स्थापन का मार्ग इसी प्रकार के संस्थानों से प्रशस्त हो सकता है।
बैठक के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि विश्वविद्यालय का सुदृढ़ विकास उससे सम्बद्ध समस्त पारंपरिक पाठशालाओं एवं संस्कृत संस्थानों के विकास का आधार बनेगा, जिससे संपूर्ण भारत में भारतीय ज्ञान परंपरा को नवीन दिशा एवं ऊर्जा प्राप्त होगी।
भेंट के उपरान्त कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने अपनी परम्परानुसार स्वामी भद्रेशदास जी एवं उनके शिष्य का अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानपूर्वक स्वागत एवं अभिनन्दन किया।
इस अवसर पर कुलसचिव श्री राकेश कुमार, वित्त अधिकारी श्री हरिशंकर मिश्र, विनयाधिकारी प्रो.जितेन्द्र कुमार सहित विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारी एवं विद्वान उपस्थित रहे।










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