
वाराणसी। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की महत्त्वाकांक्षी पहल “भारतीय भाषा पुस्तक लेखन कार्यक्रम” के उत्तर प्रदेश में प्रभावी एवं उत्कृष्ट क्रियान्वयन के विविध आयामों पर विचार-विमर्श हेतु मंगलवार को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के योग साधना सभागार में एक महत्त्वपूर्ण उपवेशन सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम में भारतीय भाषाओं में उच्चस्तरीय ज्ञान-साहित्य के सृजन, भारतीय ज्ञान-परम्परा के पुनर्स्थापन तथा भाषायी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ बनाने के विषय पर गहन मंथन किया गया।
उपवेशन में भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली के सम्माननीय सदस्य डॉ. चन्दन कुमार ने कार्यक्रम की अवधारणा, उद्देश्यों, कार्य-प्रणाली एवं भावी संभावनाओं पर विस्तृत प्रस्तुति देते हुए भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ज्ञान के भारतीयकरण तथा मातृभाषा आधारित शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने में यह योजना मील का पत्थर सिद्ध होगी।
कार्यक्रम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, शिक्षाविद एवं शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर प्रो. आर. एस. दूबे (पूर्व कुलपति, गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय एवं वर्तमान कुलाधिपति, नीपा, नई दिल्ली), प्रो. आर. के. मित्तल (कुलपति, बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ), प्रो. संजीव शर्मा (कुलपति, महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़), प्रो. ए. के. त्यागी (कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी), प्रो. राजकुमार (पूर्व कुलपति, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़) सहित अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए।
उपवेशन की अध्यक्षता करते हुए अध्यक्ष महोदय ने कहा कि भारतीय भाषाएँ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना एवं ज्ञान-परम्परा की संवाहक हैं। भारतीय भाषाओं में पाठ्य-पुस्तक निर्माण, शोध-संवर्धन एवं ज्ञान-विस्तार की दिशा में यह पहल नई शैक्षिक क्रान्ति का आधार बनेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करना समय की महती आवश्यकता है।
विमर्श के दौरान भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अकादमिक साहित्य के निर्माण, शोध को स्थानीय भाषाओं से जोड़ने तथा शिक्षा को अधिक समावेशी एवं जनोन्मुख बनाने से सम्बन्धित अनेक दूरदर्शी सुझाव प्राप्त हुए। विशेषज्ञों ने इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम बताया।
कार्यक्रम का सफल संयोजन प्रो. शैलेश कुमार मिश्र ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. उदयन मिश्र द्वारा प्रस्तुत किया गया।
उपस्थित सभी कुलपति महानुभावों, शिक्षाविदों, प्रतिनिधियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा गया कि भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन एवं ज्ञान-विस्तार के लिए सामूहिक प्रयास ही भारत को ज्ञान-समृद्ध एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने की दिशा में अग्रसर करेंगे।
यह उपवेशन भारतीय भाषाओं के माध्यम से ज्ञान-विस्तार और राष्ट्रीय पुनर्जागरण के संकल्प को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला एक महत्त्वपूर्ण एवं परिणामोन्मुख आयोजन सिद्ध हुई।










Leave a Reply