विज्ञान भारती अधिवेशन में एसटीआई नीति, वन हेल्थ एवं विकसित भारत हेतु शून्यता पर विशेषज्ञों ने किया मंथन

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में शनिवार को आयोजित विज्ञान भारती के 7वें राष्ट्रीय अधिवेशन के उद्घाटन सत्र के उपरांत तीन विषयगत सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में देशभर से आए प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों एवं विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर गहन विचार-विमर्श किया। सत्रों के विषय थे— “संकल्प : विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (एसटीआई) नीति एवं प्रस्तुति”, “वन हेल्थ” तथा “विकसित भारत के लिए नेट जीरो”। विभिन्न संस्थानों से आए विशेषज्ञों ने भारत के वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय तंत्र को सुदृढ़ बनाने, मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए समन्वित दृष्टिकोण विकसित करने तथा वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की रणनीतियों पर चर्चा की।

“विकसित भारत के लिए नेट जीरो” विषय पर आयोजित सत्र का संचालन प्रो. तृप्ता ठाकुर, कुलपति, उत्तराखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने किया। इस सत्र में ऊर्जा, सतत विकास, नाभिकीय विज्ञान तथा पर्यावरण प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने सहभागिता की। वक्ताओं ने भारत के जलवायु एवं विकास संबंधी लक्ष्यों की प्राप्ति के विभिन्न मार्गों पर चर्चा करते हुए नवीकरणीय ऊर्जा, नाभिकीय ऊर्जा, हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी, परिपत्र अर्थव्यवस्था तथा सतत नीतिगत ढाँचों की भूमिका को रेखांकित किया। सत्र में ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा समावेशी आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी आधारित समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर चर्चा की गई।

श्री मनु श्रीवास्तव, प्रमुख सचिव, ऊर्जा तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग, मध्य प्रदेश शासन ने सौर ऊर्जा के बढ़ते महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि यह अब पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य विकल्प बन चुकी है। उन्होंने रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड, ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर परियोजना तथा मध्य प्रदेश में संचालित विभिन्न कृषि-सौर परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए ऊर्जा लागत में कमी तथा नेट जीरो लक्ष्यों की प्राप्ति में उनके योगदान की जानकारी दी।

प्रो. डी. पी. सिंह, पूर्व अध्यक्ष, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने सतत विकास लक्ष्यों तथा पर्यावरणीय स्थिरता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास के लक्ष्यों में से सात सीधे तौर पर पर्यावरण से संबंधित हैं। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में सतत विकास और उत्तरदायी नागरिकता पर दिए गए विशेष बल का उल्लेख करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान को अन्य संस्थानों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बताया।

डॉ. बी. वेंकटरमण, पूर्व निदेशक, इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केन्द्र ने नेट जीरो लक्ष्य की प्राप्ति में नाभिकीय ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने जलविद्युत, पवन, सौर तथा नाभिकीय ऊर्जा के संतुलित मिश्रण की आवश्यकता पर बल देते हुए भारत के थोरियम भंडार, त्रि-स्तरीय नाभिकीय कार्यक्रम, लघु मॉड्यूलर रिएक्टर तथा फास्ट ब्रीडर रिएक्टर प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति की जानकारी दी। उन्होंने नाभिकीय ऊर्जा के विस्तार के लिए जनजागरूकता और प्रौद्योगिकी आधारित पहलों की आवश्यकता बताई।

डॉ. थल्लाडा भास्कर, निदेशक, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद-अग्रगामी पदार्थ एवं प्रक्रिया अनुसंधान संस्थान ने सतत विकास के लिए समग्र तथा परिपत्र अर्थव्यवस्था आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने इस्पात, सीमेंट, रसायन तथा उर्वरक जैसे क्षेत्रों से होने वाले उत्सर्जन को संसाधन दक्षता, अपशिष्ट उपयोग, औद्योगिक सहजीवन तथा हरित खरीद जैसी पहलों के माध्यम से कम करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. महेश सुधाकर देशपांडे, विशिष्ट वैज्ञानिक एवं समूह निदेशक, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र ने डी-कार्बोनाइजेशन के लिए हाइड्रोजन को एक स्वच्छ ऊर्जा विकल्प बताते हुए इसके उत्पादन, भंडारण तथा परिवहन से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन तथा विभिन्न राज्यों में चल रही पहलों की जानकारी भी दी।

इस सत्र के अंत में वक्ताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि नवीकरणीय ऊर्जा, नाभिकीय ऊर्जा, हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी, परिपत्र अर्थव्यवस्था तथा जनसहभागिता विकसित भारत और नेट जीरो लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

“वन हेल्थ” विषय पर आयोजित सत्र में आधुनिक चिकित्सा, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों तथा जनस्वास्थ्य के विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर चर्चा की। सत्र का संचालन डॉ. मनोज नेसारी ने किया।

सत्र का नेतृत्व डॉ. बी. एन. गंगाधर, पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के अध्यक्ष एवं निम्हांस ने किया। उन्होंने “एक राष्ट्र, एक स्वास्थ्य” की अवधारणा पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ लंबे समय से विभिन्न प्रणालियों और विशेषज्ञताओं में विभाजित रही हैं। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा तथा पर्यावरणीय चिंताओं को स्वास्थ्य व्यवस्था में समाहित करने की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए कहा कि वन हेल्थ की अवधारणा मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पशुओं, वनस्पतियों और पर्यावरण के स्वास्थ्य को भी समान महत्व देती है।

डॉ. भूषण पटवर्धन, कुलाधिपति, दक्कन विश्वविद्यालय ने वैश्विक स्वास्थ्य संकट तथा औसत आयु और स्वस्थ जीवन अवधि के बीच बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने उपचार की अपेक्षा रोकथाम आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आयुर्वेद और योग एक समन्वित स्वास्थ्य मॉडल के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

प्रो. सुबर्ण रॉय, निदेशक, आईसीएमआर-राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान ने आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी तथा योग जैसी संहिताबद्ध चिकित्सा प्रणालियों और जनजातीय एवं लोक परंपराओं पर आधारित असंहिताबद्ध प्रणालियों के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने लौह-अल्पता जनित रक्ताल्पता पर आईसीएमआर एवं आयुष मंत्रालय द्वारा किए गए संयुक्त अध्ययन का उल्लेख करते हुए बताया कि इसके परिणाम मानक उपचार पद्धतियों के तुलनीय पाए गए।

प्रो. सौरभ सिंह, प्रभारी, ट्रॉमा सेंटर, चिकित्सा विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने अस्पतालों में वन हेल्थ दृष्टिकोण के क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने मानक संचालन प्रक्रियाओं, अधोसंरचना तथा वेंटिलेशन प्रणालियों में विद्यमान कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए गहन चिकित्सा इकाइयों के लिए भारत-विशिष्ट वायु गुणवत्ता मानकों की आवश्यकता पर बल दिया।

“संकल्प : विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (एसटीआई) नीति एवं प्रस्तुति” विषय पर आयोजित सत्र में प्रतिभागियों ने विकसित भारत के निर्माण की दिशा में विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार की भूमिका को सुदृढ़ बनाने के प्रति अपनी सामूहिक प्रतिबद्धता व्यक्त की। सत्र में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा विद्यार्थियों ने व्यापक सहभागिता करते हुए प्रस्तावित एसटीआई संकल्प को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए। प्रतिभागियों ने आयुर्वेद सहित पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के साथ समन्वित करने, विद्यार्थियों में वैज्ञानिक साक्षरता को बढ़ावा देने तथा अनुसंधान के परिणामों को व्यवहारिक उपयोग में लाने की प्रक्रिया को सुदृढ़ करने पर चर्चा की।

डॉ. रंजना अग्रवाल, प्रमुख, विज्ञान भारती ने प्रस्तावित संकल्प की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए बताया कि विज्ञान भारती की राष्ट्रीय अधिवेशन परंपरा के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष एक संकल्प पारित किया जाता है, जो आगामी वर्ष के लिए संगठन की रणनीतिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करता है। प्रो. अविनाश चन्द्र पाण्डेय, निदेशक, अंतर- विश्वविद्यालय त्वरक केन्द्र, नई दिल्ली ने संकल्प के विभिन्न प्रावधानों पर चर्चा का मार्गदर्शन किया तथा सर्वसम्मति निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

विद्यार्थियों ने स्वास्थ्य संबंधी अनुसंधान को प्राथमिकता देने तथा अनुसंधान और उसके क्रियान्वयन के बीच की दूरी को कम करने की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किए। प्रतिभागियों ने संकल्प पर सुझाव दिया कि वैज्ञानिक निवेश और अनुसंधान के परिणाम सीधे राष्ट्रीय विकास तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता में योगदान दें। साथ ही जनजातीय क्षेत्रों एवं स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों पर आधारित नवाचार को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर भी सुझाव प्रस्तुत किए गये।

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