अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र में छः दिवसीय आनलाइन कार्यशाला का हुआ समापन

 

वाराणसी अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र (आईयूसीटीई), वाराणसी द्वारा आयोजित *“भारतीय ज्ञान परम्परा”* विषयक छः दिवसीय ऑनलाइन संकाय विकास कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ। यह कार्यक्रम प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी तथा प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान), आईयूसीटीई, वाराणसी के निर्देशन में आयोजित हुआ।

 

कार्यक्रम के छठे दिवस के प्रथम सत्र में प्रो. प्रवीन कुमार तिवारी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने “रिसर्च मेथडोलॉजी इन आई.के.एस. (वर्किंग विद क्लासिकल टेक्स्ट्स, मैन्युस्क्रिप्ट्स एंड इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च)” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली (आई.के.एस.) में शोध पद्धति को एक नई दृष्टि से परिभाषित किया जा रहा है। शास्त्रीय ग्रंथों एवं पांडुलिपियों पर आधारित अध्ययन शोधकर्ताओं को प्रामाणिक एवं मूल स्रोतों तक पहुँच प्रदान करता है। उन्होंने अंतरविषयक शोध की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इसके माध्यम से विज्ञान, साहित्य, दर्शन और इतिहास जैसे विविध विषयों को एकीकृत दृष्टिकोण के साथ समझने का अवसर प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि आई.के.एस. आधारित शोध पद्धति परम्परा और आधुनिकता के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए युवा शोधकर्ताओं को भारतीय ज्ञान की गहराई तथा उसके वैश्विक संदर्भों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।

 

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान), आईयूसीटीई, वाराणसी ने “इंटरनेशनलाइजेशन ऑफ आई.के.एस. एंड इंस्टीट्यूशनल स्ट्रैटेजीज़” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली के अंतरराष्ट्रीयकरण की आवश्यकता और इस दिशा में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों में आई.के.एस.-आधारित पाठ्यक्रमों, शोध एवं अकादमिक गतिविधियों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने के लिए प्रभावी संस्थागत रणनीतियों की आवश्यकता है। शोध सहयोग, अंतरराष्ट्रीय अकादमिक साझेदारी तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारतीय ज्ञान परम्परा को वैश्विक विमर्श से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास भारत की समृद्ध बौद्धिक एवं ज्ञान परम्परा को विश्व स्तर पर एक विशिष्ट पहचान प्रदान करने में सहायक होगा।

 

कार्यक्रम के तृतीय सत्र में “इंस्टीट्यूशनल एक्शन प्लान फॉर आई.के.एस. इंटीग्रेशन” विषय पर समूहगत प्रस्तुतियाँ आयोजित की गईं। इस सत्र में प्रतिभागियों ने अपने-अपने संस्थानों में भारतीय ज्ञान परम्परा को पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, शोध, संकाय विकास तथा सामुदायिक सहभागिता के विभिन्न आयामों में समाहित करने हेतु एक संस्थागत कार्ययोजना एवं रोडमैप प्रस्तुत किया। प्रतिभागियों ने इस बात पर विचार-विमर्श किया कि भारतीय ज्ञान परम्परा के विभिन्न सिद्धांतों, अवधारणाओं एवं ज्ञान-स्रोतों को समकालीन उच्च शिक्षा की आवश्यकताओं के अनुरूप किस प्रकार प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. राजा पाठक एवं डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई ने की। चतुर्थ सत्र में प्रतिभागियों का व्यक्तिगत असेसमेंट किया गया। साथ ही इस सत्र में प्रतिभागियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर स्वयं के कार्ययोजना पर व्यक्तिगत प्रस्तुतियाँ भी दीं।

 

इस छः दिवसीय ऑनलाइन संकाय विकास कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों से 100 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी तथा डॉ. राजा पाठक, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई, द्वारा किया गया।

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