औरंगाबाद हाउस को समझे बिना कमलापति त्रिपाठी को नहीं समझा जा सकता’: – व्योमेश शुक्ल

वाराणसी। पं. कमलापति त्रिपाठी की 121वीं जयंती पर औरंगाबाद हाउस में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि एवं वरिष्ठ साहित्यकार, कवि, रंगकर्मी तथा नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल को पं. कमलापति त्रिपाठी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान के तहत उन्हें प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिह्न और एक लाख रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई।

सम्मान ग्रहण करने के बाद अपने संबोधन में व्योमेश शुक्ल ने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी को केवल एक राजनेता के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। उन्हें समझने के लिए औरंगाबाद हाउस की सदियों पुरानी ज्ञान, संस्कार, साहित्य और सांस्कृतिक परंपरा को समझना जरूरी है।

 

व्योमेश शुक्ल ने कहा कि औरंगाबाद हाउस को केवल पिछले सौ वर्षों की राजनीतिक गतिविधियों के संदर्भ में देखना इसके वास्तविक महत्व को कम करना होगा। इस घर में राजनीति से कहीं पहले ज्ञान और शास्त्र की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि पिछले सौ वर्षों में यहां जितनी सक्रिय राजनीति हुई, उससे कहीं लंबी और महत्वपूर्ण वह परंपरा है, जिसमें इसके पहले लगभग चार सौ वर्षों तक ज्ञान का प्रवाह चलता रहा। इसी परंपरा ने पं. कमलापति त्रिपाठी के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें राजनीतिक जीवन में नैतिक साहस दिया।

 

उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी परंपरा और इतिहास से अलग करके नहीं समझा जा सकता। व्यक्ति अकेला नहीं होता, उसके भीतर उसके परिवार, समाज और पूर्वजों की स्मृतियां और संस्कार भी मौजूद रहते हैं। उन्होंने कहा, “आप अकेले नहीं बोल रहे हैं। आपकी हड्डियों में, आपकी शिराओं में, आपके रक्त में कोई ऋषि-मुनि, कोई तपस्वी, कोई राजपुरुष और हो सकता है कोई गद्दार भी बोल रहा है।” इसलिए किसी व्यक्ति को उसके संदर्भ से काटकर देखने पर उसकी वास्तविक पहचान और ऐतिहासिक भूमिका अधूरी रह जाती है।

 

व्योमेश शुक्ल ने काशी और उत्तर भारत की पारिवारिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां कई परिवारों की अनेक पीढ़ियों की स्मृतियां आज भी जीवित हैं। पं. कमलापति त्रिपाठी, पं. नारायणपति त्रिपाठी, पं. रामानंद तिवारी और पं. करुणापति त्रिपाठी जैसे व्यक्तित्वों को समझने के लिए उनके पारिवारिक और सांस्कृतिक संदर्भ को सामने रखना होगा। उन्होंने कहा कि परंपरा को काट देने का अर्थ जीवित इतिहास को संग्रहालय की वस्तु में बदल देना है।

 

उन्होंने पं. कमलापति त्रिपाठी के स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश और उनकी पहली जेल यात्रा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उस पीढ़ी के लोगों के लिए सार्वजनिक जीवन उनके निजी जीवन-मूल्यों से अलग नहीं था। उन्होंने उनके शुरुआती चुनाव से जुड़े प्रसंग का भी उल्लेख किया और कहा कि चुनाव में खर्च हुई करीब पांच हजार रुपये की राशि को बाद में पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे में उनके हिस्से से काट लिया गया। ऐसे प्रसंग उस समय की राजनीति और सार्वजनिक नैतिकता की प्रकृति को समझने में मदद करते हैं।

 

अपने संबोधन में व्योमेश शुक्ल ने नागरी प्रचारिणी सभा और पं. कमलापति त्रिपाठी के पुराने रिश्ते को विशेष रूप से याद किया। उन्होंने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा का पं. कमलापति त्रिपाठी से गहरा आत्मीय संबंध था। लंबे अंतराल के बाद नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से औरंगाबाद हाउस में उपस्थित होने को उन्होंने भावुक क्षण बताया। उन्होंने कहा, “नागरी प्रचारिणी सभा ने जिस कदर पंडित जी का दिल तोड़ा है, उसकी मिसाल के लिए मैं आज क्षमा मांगने आया हूं।”

 

उन्होंने कहा कि समय के साथ राजनीतिक खेमेबंदी और दूरियां बढ़ीं और एक समय ऐसा लगा जैसे एक तरफ औरंगाबाद हाउस है और दूसरी तरफ नागरी प्रचारिणी सभा। लेकिन यह दूरी उस सांस्कृतिक रिश्ते से बड़ी नहीं थी, जो दोनों के बीच रहा है। उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा के पुराने सेवक केशरी नारायण त्रिपाठी का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्था के कठिन दौर में पं. कमलापति त्रिपाठी से इसे सरकार के अधीन लेने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।

 

शुक्ल ने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी चाहते तो अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर नागरी प्रचारिणी सभा को सरकारी संस्था का स्वरूप दिला सकते थे, लेकिन उन्होंने संस्था की स्वायत्तता को खत्म करना स्वीकार नहीं किया। उनका विश्वास था कि संस्था को अपनी आंतरिक शक्ति से फिर खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संस्थाओं की स्वायत्तता के प्रति पं. कमलापति त्रिपाठी का यह दृष्टिकोण आज भी महत्वपूर्ण है।

 

उन्होंने कहा कि आज राजनीति में ‘विकास’ शब्द का बहुत इस्तेमाल होता है, लेकिन पं. कमलापति त्रिपाठी ने लोककल्याण के माध्यम से विकास का अर्थ बहुत पहले सामने रखा था। विकास का अर्थ केवल निर्माण नहीं, बल्कि समाज का खिलना, प्रकाशित होना और अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आगे बढ़ना भी है। रेलवे के क्षेत्र में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ट्रेनों और डीजल इंजनों के नामकरण में भी भारतीय सांस्कृतिक चेतना को स्थान देने की कोशिश की गई। ‘हिंदू’, ‘नीलाचल’, ‘काशी विश्वनाथ’, ‘काशी-दादर’, ‘महानगरी’ और ‘गंगा-कावेरी’ जैसे नाम इसी सांस्कृतिक दृष्टि के उदाहरण हैं।

 

व्योमेश शुक्ल ने औरंगाबाद हाउस की विद्वत परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस परिवार में स्कंद पुराण के काशी खंड का हिंदी रूपांतरण हुआ तथा तंत्र, न्याय, मीमांसा और व्याकरण जैसे विषयों पर गंभीर काम हुआ। उन्होंने कहा कि राजनीतिक जीवन में कठिन निर्णय लेने और सत्ता के सामने असुविधाजनक बात कहने का नैतिक साहस केवल राजनीति से नहीं आता, बल्कि उसके पीछे गहरी वैचारिक और सांस्कृतिक जमीन होती है। पं. कमलापति त्रिपाठी को यह जमीन उनके परिवार और काशी की परंपरा से मिली थी।

 

उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा के इतिहास को भी याद किया और कहा कि हिंदी और नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए स्थापित इस संस्था ने उस दौर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जब अदालतों और सरकारी कामकाज में अंग्रेजी और फारसी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू का प्रभाव था। उन्होंने बाबू श्यामसुंदर दास, पं. रामनारायण मिश्र, शिवकुमार सिंह और महामना मदन मोहन मालवीय सहित हिंदी आंदोलन से जुड़े लोगों को याद किया।

 

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी संस्था ने अपने गठन के समय का उद्देश्य पूरा कर लिया तो क्या उसके बाद उसका अस्तित्व समाप्त हो जाना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि उसका उद्देश्य देश को स्वतंत्र कराना था और स्वतंत्रता मिलने के बाद वह उद्देश्य पूरा हो गया, तो क्या कांग्रेस को समाप्त कर दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि संस्थाएं केवल अपने तत्कालीन उद्देश्य के लिए नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की स्मृति, संवाद और सामूहिक चेतना को भी जीवित रखती हैं।

 

वर्तमान समय में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर चिंता जताते हुए व्योमेश शुक्ल ने कहा कि आज विकास की दौड़ में यह तय करना जरूरी है कि हम अपनी स्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान में से क्या बचाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह बाढ़ में जरूरी चीजों को तत्काल बचाना पड़ता है, उसी तरह संस्कृति को भी “कतरा-कतरा” बचाने की जरूरत है। उन्होंने पानी, धरोहर, रामलीला, बच्चों का बचपन, मंदिर और वृक्ष बचाने का आह्वान किया।

 

उन्होंने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी की जयंती केवल एक राजनेता को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि काशी की उस परंपरा को समझने का अवसर है जिसमें ज्ञान, साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता, राजनीति और लोकजीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। उन्होंने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी की विरासत को बड़े नारों से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं, स्मृतियों और सांस्कृतिक परंपराओं को बचाकर आगे बढ़ाया जा सकता है, जिनसे उनका व्यक्तित्व निर्मित हुआ था।

 

समारोह में विधान परिषद सदस्य पं. राजेशपति त्रिपाठी ने भी व्योमेश शुक्ल को नागरी प्रचारिणी सभा का प्रधानमंत्री चुने जाने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि व्योमेश शुक्ल नागरी प्रचारिणी सभा को फिर उस ऊंचाई तक ले जाएंगे, जहां हिंदी की इस ऐतिहासिक संस्था की प्रतिष्ठा रही है। उन्होंने हिंदी के लिए काम करने वाली पुरानी पीढ़ी और संविधान सभा के दौर में हिंदी के पक्ष में खड़े रहे पं. कमलापति त्रिपाठी सहित अन्य विद्वानों के योगदान को याद किया।

 

राजेशपति त्रिपाठी ने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी का जीवन सत्ता की राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने राजनीति को जनसेवा और राष्ट्रसेवा का माध्यम माना। उनकी सबसे बड़ी विरासत राजनीतिक मर्यादा थी, जिसमें विरोधी के प्रति सम्मान और असहमति के बावजूद संवाद की जगह बनी रहती थी। उन्होंने कहा कि आज के राजनीतिक वातावरण में पं. कमलापति त्रिपाठी की शालीनता, संयम और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा को याद करना पहले से अधिक जरूरी है।

 

कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर शिवकुमार शर्मा का श्रद्धांजलि संदेश भी पढ़ा गया, जिसमें पं. कमलापति त्रिपाठी को “काशी की माटी का दीपक” बताते हुए उनके त्याग, सेवा और सार्वजनिक जीवन की शुचिता को याद किया गया। पं. कमलापति त्रिपाठी के साथ स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजसेवी पं. रामप्रवेश चौबे को भी श्रद्धांजलि दी गई।

 

समारोह का संचालन विजयशंकर पांडेय ने किया। कार्यक्रम में पं. राजेशपति त्रिपाठी, व्योमेश शुक्ल, संतोष जैन, सतीश चौबे, सतीश राय, सुनी देवी, सुनैना पटेल, प्रोफेसर शिवकुमार शर्मा और विजय विनीत समेत साहित्य, पत्रकारिता, संस्कृति, राजनीति और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक लोग मौजूद रहे।

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