
वाराणसी।हिंदी दिवस के अवसर पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के दर्शन संकाय द्वारा योगसाधना केन्द्र में मध्याह्न ‘स्वराज्य, स्वबोध और भारतीय भाषाओं की भूमिका’ विषय पर विशेष व्याख्यान एवं विचार-विमर्श कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता स्वामीनारायण गुरुकुल विश्वविद्यालय प्रतिष्ठानम्, गुजरात के अध्यक्ष एवं वेदान्तशास्त्र के विश्वविख्यात आचार्य स्वामी माधवप्रियदास जी रहे। इस अवसर पर उनके द्वारा रचित ‘श्रीस्वामीनारायणदर्शनसारसंग्रह’ ग्रंथ का लोकार्पण भी किया गया।
बतौर मुख्य वक्ता स्वामी माधवप्रियदास जी ने कहा कि गुरु के बिना ग्रंथों का ज्ञान अधूरा है, क्योंकि गुरु शास्त्र के ज्ञान को जीवन के अनुभव और साधना से जोड़कर उसके वास्तविक अर्थ का बोध कराते हैं। भारतीय ज्ञान-परम्परा में वेद, शास्त्र और गुरु-तीनों का विशेष महत्त्व है।
उन्होंने कहा कि स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का नाम नहीं है, बल्कि स्वच्छ भारत, आत्मनिर्भर भारत और अपनी अस्मिता के प्रति जागृत भारत ही वास्तविक स्वराज्य है। स्वराज्य के साथ स्वबोध आवश्यक है और स्वबोध तभी संभव है, जब हमें अपनी भाषा, संस्कृति, इतिहास एवं ज्ञान-परम्परा का सम्यक् परिचय हो।
स्वामी जी ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में एकता में निहित है। विभिन्न भाषाओं, मतों, पंथों और परम्पराओं के बावजूद भारत की सांस्कृतिक चेतना एक है। हमारी भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी अस्मिता, संस्कार और ज्ञान-परम्परा की जीवंत वाहक हैं।
उन्होंने कहा कि वेद आदि प्राचीन ग्रंथों के अभाव में हमें स्वराज्य और स्वबोध की मूल अवधारणा का ज्ञान नहीं हो सकता था। औपनिवेशिक काल में भारतीय भाषाओं और गुरुकुल परम्परा को कमजोर करने के प्रयास हुए, इसलिए आज आवश्यकता है कि शास्त्रों के संरक्षण के साथ भाषा के प्रति भाव, गौरव और संवेदनशीलता को भी जागृत किया जाए।
उन्होंने डिजिटल युग को भारतीय भाषाओं के संरक्षण का महत्वपूर्ण अवसर बताते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से शास्त्रीय ग्रंथों और भारतीय ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए। साथ ही वेद-शास्त्रों में उपलब्ध ज्ञान का आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर अध्ययन एवं अनुसंधान कर वास्तविक निष्कर्षों तक पहुंचने का प्रयास होना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए दर्शन संकायाध्यक्ष एवं तुलनात्मक धर्म-दर्शन विभागाध्यक्ष प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा कि स्वराज्य की संकल्पना स्वबोध के बिना अधूरी है। व्यक्ति और समाज को अपनी भाषा, संस्कृति, परम्परा और ज्ञान-स्रोतों का बोध होगा, तभी स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ जीवन में उतर सकेगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाएँ भारत के सामूहिक अनुभव और चिंतन की अभिव्यक्ति हैं। हिंदी दिवस को केवल हिंदी के प्रयोग और प्रचार तक सीमित न रखते हुए इसे समस्त भारतीय भाषाओं के सम्मान तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के पुनर्बोध का अवसर बनाना चाहिए। भाषा के संरक्षण का अर्थ अपनी सांस्कृतिक स्मृति और राष्ट्रीय अस्मिता का संरक्षण भी है।
वेदान्त विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि भारतीय भाषाओं में हमारी संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म और जीवन-दृष्टि का अमूल्य भंडार सुरक्षित है। इसलिए भाषा का संरक्षण केवल शब्दों का संरक्षण नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित भारतीय ज्ञान और संस्कारों का संरक्षण है।
उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में विश्वविद्यालयों, विद्वानों और नई पीढ़ी को मिलकर भारतीय ग्रंथों के अध्ययन, संरक्षण, डिजिटलीकरण और व्यापक प्रसार की दिशा में कार्य करना चाहिए। हिंदी दिवस इस संकल्प को और अधिक व्यापक बनाने का अवसर है।
कार्यक्रम के दौरान स्वामी माधवप्रियदास जी द्वारा रचित ‘श्रीस्वामीनारायणदर्शनसारसंग्रह:’ ग्रंथ का गरिमापूर्ण लोकार्पण किया गया। ग्रंथ-लोकार्पण को भारतीय दार्शनिक एवं आध्यात्मिक चिंतन की समृद्ध परम्परा को समकालीन विमर्श से जोड़ने की महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा गया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक एवं पौराणिक मंगलाचरण तथा दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। अतिथियों का स्वागत-अभिनंदन एवं बीज वक्तव्य प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. सुधाकर मिश्र ने किया। इस अवसर पर स्वामी माधवप्रियदास जी को अभिनंदन-पत्र/प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में प्रो. जितेन्द्र कुमार,प्रो कमलाकांत त्रिपाठी, प्रो. हीरक कान्ति चक्रवर्ती, प्रो. शैलेश कुमार मिश्र, प्रो. राजनाथ, प्रो. शम्भूनाथ शुक्ल, प्रो. विजय कुमार पाण्डेय, प्रो. अमित कुमार शुक्ल, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. विजेन्द्र आर्य, डॉ. विजय कुमार शर्मा, डॉ दुर्गेश पाठक,डॉ. नितिन आर्य सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी एवं अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।

Leave a Reply