वसंत कन्या महाविद्यालय में तुलसीदास – नन्ददास जयंती समारोह -2026

वाराणसी।वसन्त कन्या महाविद्यालय में शुक्रवार को हिन्दी विभाग द्वारा तुलसीदास-नंददास जयंती समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ‘आज का परिदृश्य और रामचरितमानस की उपादेयता’ व ‘भ्रमरगीत परम्परा व नंददास’ विषयक रहा।

कार्यक्रम का शुभारम्भ महाविद्यालय के कुलगीत गायन से किया गया। इसके पश्चात एनी बेसेन्ट, तुलसीदास व नंददास जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर दीप प्रज्ज्वलित किया गया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. रविशंकर सोनकर व समारोह की विषय विशेषज्ञ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग की सहायक आचार्या डॉ. प्रीति त्रिपाठी का स्वागत उत्तरीय और स्मृति चिन्ह प्रदान कर महाविद्यालय की प्राचार्या व हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्षा द्वारा किया गया।

इस समारोह में संगीत गायन विभाग की विभागाध्यक्षा प्रो. सीमा वर्मा जी के निर्देशन में संगीत विभाग की छात्राओं द्वारा तुलसी प्रशस्ति गीत का भी गायन किया गया। प्रशस्ति गीत में तबले पर प्रो. सौम्यकांत मुखर्जी जी ने साथ दिया।

इस अवसर पर कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. शुभांगी श्रीवास्तव ने तुलसीदास द्वारा रचित विनय पत्रिका के पदों का सस्वर गायन किया।

हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्षा प्रो. आशा यादव ने अपने स्वागत वक्तव्य में हमारे आज के विषयों पर हमारा ध्यानाकर्षित करते हुए कहा कि रामचरितमानस हमें कर्तव्यपरायणता, साहस व सौहार्द सिखाता है व प्रत्येक प्राणी को प्रेम, सहिष्णुता के साथ आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करते हुए मानवीय मूल्यों को भी सिखाता है। इस युग की समसामयिक परिस्थितियों में हमारे युवा भारतीय ज्ञान परम्परा को अपनाकर चारित्रिक उत्थान कर सकते हैं। उन्होनें आलोचक हरिवंश लाल शर्मा के कुछ अंशों को भी बताया।

समारोह की विषय विशेषज्ञ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सहायक आचार्या डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज के समय में रामचरितमानस पर विचार करना स्थगित हो चुके मानवीय मूल्यों की पुनर्वापसी है। तुलसी का व्यक्तित्व रामकथा कहते-कहते कितना अनुकरणीय बन जाता है व तुलसी की भक्ति प्रेमाभिभूत होकर जीवन जीने का मार्ग सिखाती है। मानस की विशेषता यह है कि इसमे जीवन का केवल निषेध नहीं है बल्कि एक खोजबीन है। तुलसी जन-जन में राम को देखने के विश्वासी हैं। रामचरितमानस से हमें आध्यात्मिक व मानसिक शांति के साथ करणीय व अकरणीय का ज्ञान मिलता है। मानस त्याग की संस्कृति का नाम है यह उपभोग की वृत्ति की वकालत नहीं करता। उन्होनें कहा कि तुलसी कहीं कर्मवादी तो कहीं भाग्यवादी नजर आते हैं व आत्मानुजन व आत्मसुधार को हमें तुलसी के माध्यम से अपनाने को कहा।

इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. रविशंकर सोनकर ने अपने वक्तव्य में भ्रमरगीत को कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम से जोड़ते हुए सूरदास से व भागवत के दशम अध्याय से जोड़ा। उन्होंने बताया कि भ्रमरगीत प्राचीन व अर्वाचीन से लेकर हमारे वर्तमान परम्परा में जड़ों से जुड़ा हुआ है। भ्रमरगीत का पूरा का पूरा संदेश प्राचीन काल से लेकर वर्तमान युग तक गुंजायमान है। मनुष्य की चेतना को उदात्त बनाने के समस्त गुण भक्तिकाल के रचनाकारों की रचनाओं में विद्यमान है।
इस कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन वसन्त कन्या महाविद्यालय हिन्दी विभाग की आचार्या डॉ. सपना भूषण ने किया। उन्होनें कार्यक्रम के मुख्य वक्ताओं के प्रति धन्यवाद अर्पित करते हुए कहा कि आज के वक्ताओं ने कार्यक्रम के विषय पर अपने ज्ञान भंडारण के सार हमारे सामने रखे इससे बच्चों का ज्ञानवर्धन हुआ होगा। उन्होनें महाविद्यालय की प्राचार्या की उपस्थिति व सहयोग को भी सराहा व हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्षा व कार्यक्रम की संयोजिका को इस सुन्दर समारोह के लिए कृतज्ञता अर्पित की। साथ ही साथ कार्यक्रम मे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित सभी लोगो के प्रति आभार प्रकट किया।
कार्यक्रम का कुशल संचालन परास्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा जिज्ञासा मिश्रा ने किया। इस कार्यक्रम का सफल संयोजन डॉ. शुभांगी श्रीवास्तव द्वारा किया गया। इस अवसर पर हिन्दी विभाग से प्रो. सपना भूषण, प्रो. शशिकला, डॉ. प्रीति विश्वकर्मा (अतिथि), डॉ. आर्यपुत्र दीपक (अतिथि), सुश्री राजलक्ष्मी जायसवाल (अतिथि) सहित अन्य आचार्या व आचार्य और सैकड़ो छात्राएं भी उपस्थित रहीं।

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