विश्वविद्यालय के डॉ. विजय कुमार शर्मा और डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा ने प्रस्तुत किया विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान, मिला महर्षि पुरस्कार

वाराणसी/नाशिक। भारतीय ज्ञान-परंपरा, वेद, संस्कृत एवं शास्त्रीय चिंतन के क्षेत्र में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी की विद्वत्ता को राष्ट्रीय मंच पर एक और सम्मान मिला है। नाशिक में आयोजित ‘ज्ञान कुंभ-2026’ में विश्वविद्यालय के दो विद्वानों को वैदिक एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘महर्षि पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

 

महर्षि पंचायतन सिद्धपीठ, नाशिक के तत्वावधान में 26 एवं 27 सितम्बर को आयोजित द्विदिवसीय ज्ञान कुंभ में देशभर से विद्वान, आचार्य, शोधकर्ता एवं संस्कृतप्रेमी शामिल हुए। विश्वविद्यालय के वेद विभाग के सहायक आचार्य डॉ. विजय कुमार शर्मा तथा व्याकरण विभाग के डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा को आमंत्रित विद्वान के रूप में सहभागिता का अवसर मिला।

 

डॉ. विजय कुमार शर्मा ने ‘कुंभ महापर्व पर वैदिक दृष्टि’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कुंभ की वैदिक पृष्ठभूमि, जल एवं तीर्थ की भारतीय अवधारणा तथा इसके आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को स्पष्ट किया। उन्होंने प्रयागराज, हरिद्वार, नाशिक और उज्जैन की कुंभ परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि कुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, साधना, संत-परंपरा और विद्वत् संवाद का विराट मंच है।

 

डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा ने संस्कृत एवं भारतीय शास्त्रीय परंपरा के विविध आयामों पर प्रकाश डालते हुए वैदिक ज्ञान के संरक्षण, अध्ययन और वर्तमान संदर्भों में उसकी उपयोगिता को रेखांकित किया। दोनों विद्वानों के व्याख्यान को विद्वत्समाज ने सराहा।

ज्ञान कुंभ के अवसर पर महर्षि पंचायतन सिद्धपीठ की ओर से दोनों विद्वानों को ‘महर्षि पुरस्कार’ प्रदान किया गया। सम्मान पर विश्वविद्यालय के आचार्यों, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं समस्त विश्वविद्यालय परिवार ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए दोनों विद्वानों को बधाई दी।

विश्वविद्यालय के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वैदिक एवं शास्त्रीय ज्ञान की उसकी समृद्ध परंपरा को राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित मंच पर सम्मान मिला है।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता महर्षि पंचायतन सिद्ध पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी डॉ. अनिकेत शास्त्री जी महाराज की रही। कार्यक्रम में प्रो. सुधाकर मिश्र, प्रो. कमलाकांत त्रिपाठी, प्रो. धर्मदत्त चतुर्वेदी, डॉ. आशीष मणि त्रिपाठी, विद्वान शांताराम भानुसे सहित नाशिक एवं त्र्यम्बकेश्वर के अनेक विद्वान उपस्थित रहे।

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