उत्तर प्रदेश शासन ने स्पष्ट किया -सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की आचार्य (संस्कृत) उपाधि स्नातकोत्तर उपाधि है; अभ्यर्थियों को आवेदन में कोई कठिनाई नहीं

मुख्यमन्त्री कार्यालय के त्वरित हस्तक्षेप एवं शासन की संवेदनशीलता से दूर हुआ भ्रम:- कुलपति प्रो शर्मा।

 

वाराणसी।सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से आचार्य (संस्कृत) उपाधि प्राप्त अभ्यर्थियों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं आश्वस्तकारी स्थिति स्पष्ट हुई है। उत्तर प्रदेश शासन के माध्यमिक शिक्षा अनुभाग-5 द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से निर्गत आचार्य (संस्कृत) विषय की उपाधि स्नातकोत्तर उपाधि है तथा ऐसे आचार्य उपाधिधारी अभ्यर्थियों को उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग द्वारा प्रकाशित विज्ञापन संख्या-06/2026, दिनांक 15 सितम्बर 2026 के अन्तर्गत प्रवक्ता (संस्कृत) पद हेतु आवेदन करने में कोई कठिनाई नहीं है।

सरकार द्वारा जारी शासनादेश उन सभी विद्यार्थियों एवं अभ्यर्थियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनके मध्य प्रवक्ता (संस्कृत) के हाल में प्रकाशित विज्ञापन में निर्धारित शैक्षिक अर्हता को लेकर असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

 

 

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) बिहारी लाल शर्मा ने इस विषय को विश्वविद्यालय के आचार्य उपाधिधारी विद्यार्थियों के शैक्षिक हित एवं उनके भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय मानते हुए उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष तथा माध्यमिक शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष तथ्यपरक रूप से उठाया।

कुलपति ने इस सन्दर्भ में मुख्यमन्त्री कार्यालय से भी संवाद स्थापित कर पूरे विषय से अवगत कराया। संवाद के क्रम में यह स्पष्ट हुआ कि विज्ञापन में उत्पन्न स्थिति किसी प्रकार की नीतिगत असहमति अथवा संस्कृत विषय की उपेक्षा का परिणाम नहीं थी, बल्कि विज्ञापन की भाषा, शब्दावली अथवा कार्यालयीय स्तर पर हुई भ्रान्ति के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी।

 

 

कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के अनुसार, जैसे ही यह विषय माननीय मुख्यमन्त्री जी के कार्यालय के संज्ञान में लाया गया, मुख्यमन्त्री कार्यालय द्वारा विषय की गम्भीरता एवं विद्यार्थियों के हित को तत्काल समझते हुए इसके समाधान के लिए आश्वस्त किया गया और शासन स्तर से इसका उचित समाधान सुनिश्चित करने की दिशा में त्वरित कार्यवाही की गई।

 

 

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश शासन के माध्यमिक शिक्षा अनुभाग-5 द्वारा उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज को पत्र जारी कर स्थिति को स्पष्ट किया गया। शासन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि विश्वविद्यालय से निर्गत आचार्य (संस्कृत) विषय की उपाधि स्नातकोत्तर उपाधि है तथा आचार्य (संस्कृत) योग्यताधारी अभ्यर्थियों को उक्त विज्ञापन के अन्तर्गत प्रवक्ता (संस्कृत) पद हेतु आवेदन करने में कोई कठिनाई नहीं है।

 

 

कुलपति प्रो.बिहारी लाल शर्मा ने इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार एवं माननीय मुख्यमन्त्री जी के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि मुख्यमन्त्री कार्यालय से हुए संवाद में यह अत्यन्त स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि उत्तर प्रदेश सरकार संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति, सनातन ज्ञान-परम्परा एवं भारतीय परम्पराओं के संरक्षण, संवर्धन तथा उनके रचनात्मक विकास के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है।

 

कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि

विज्ञापन में उत्पन्न यह स्थिति किसी नीतिगत निर्णय का परिणाम नहीं थी। यह मुख्यतः कार्यालयीय स्तर पर उत्पन्न हुई एक भाषायी अथवा शब्दावली सम्बन्धी भ्रांति थी, जिसके कारण हमारे आचार्य उपाधिधारी विद्यार्थियों के मध्य स्वाभाविक रूप से असमंजस की स्थिति बनी। जैसे ही यह विषय माननीय मुख्यमंत्री जी के कार्यालय के संज्ञान में आया, उसे अत्यंत संवेदनशीलता एवं तत्परता के साथ लिया गया और इसके समाधान का मार्ग प्रशस्त किया गया। इसके लिए मैं माननीय मुख्यमंत्री जी तथा उत्तर प्रदेश शासन के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की समृद्ध संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भारत के ज्ञान-आधारित भविष्य के निर्माण की महत्वपूर्ण आधारभूमि है। प्रदेश सरकार द्वारा संस्कृत, संस्कृति और भारतीय परम्पराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयास इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।

कुलपति ने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी शासन स्तर पर ऐसी किसी भी स्थिति में विद्यार्थियों के हितों और संस्कृत शिक्षा की विशिष्ट प्रकृति को ध्यान में रखते हुए त्वरित एवं संवेदनशील समाधान सुनिश्चित किया जाएगा

 

 

कुलपति ने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य (संस्कृत) उपाधि प्राप्त सभी अभ्यर्थियों से आग्रह किया कि शासन द्वारा जारी इस स्पष्टता के पश्चात वे किसी प्रकार के भ्रम अथवा असमंजस में न रहें और यदि वे विज्ञापन में निर्धारित अन्य आवश्यक शर्तों को पूरा करते हैं तो प्रवक्ता (संस्कृत) पद हेतु निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपना आवेदन प्रस्तुत करें।

 

 

उन्होंने कहा कि शासन का यह स्पष्टीकरण न केवल वर्तमान भर्ती प्रक्रिया के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की आचार्य (संस्कृत) उपाधि के स्नातकोत्तर स्वरूप की आधिकारिक स्थिति भी स्पष्ट हुई है।

कुलपति ने कहा कि हमारे विद्यार्थियों की शैक्षिक योग्यता और उनके अवसरों की रक्षा करना विश्वविद्यालय का दायित्व है। इसी दायित्व के निर्वहन के क्रम में विश्वविद्यालय ने शासन एवं आयोग के समक्ष यह विषय रखा। हमें प्रसन्नता है कि शासन ने विषय की वास्तविकता को समझते हुए त्वरित रूप से स्थिति स्पष्ट की। इससे हमारे आचार्य उपाधिधारी विद्यार्थियों के मन में उत्पन्न संशय का निराकरण हुआ है।

 

 

कुलपति ने कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों के शैक्षिक अधिकारों, अकादमिक सम्मान, रोजगार के अवसरों तथा भविष्य की संभावनाओं के प्रति सदैव सजग रहेगा।

उन्होंने विश्वविद्यालय के आचार्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों, वर्तमान विद्यार्थियों, पूर्व विद्यार्थियों, आचार्य उपाधिधारकों तथा संस्कृत-जगत के सभी हितैषियों से आग्रह किया कि उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जारी इस स्पष्ट आदेश की जानकारी अधिकाधिक पात्र अभ्यर्थियों तक पहुँचाई जाए, ताकि किसी भी विद्यार्थी को पूर्व में उत्पन्न भ्रम के कारण आवेदन के अवसर से वंचित न होना पड़े।

कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की संस्कृत, संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण और संवर्धन के प्रति प्रतिबद्धता तथा मुख्यमंत्री कार्यालय की त्वरित संवेदनशीलता ने इस विषय को समाधान तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्वविद्यालय इसके लिए शासन के प्रति कृतज्ञ है और आशा करता है कि भविष्य में भी संस्कृत शिक्षा एवं उसके विद्यार्थियों के हितों से जुड़े विषयों पर इसी प्रकार का सकारात्मक, संवेदनशील और त्वरित सहयोग प्राप्त होता रहेगा।

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