लेखक वैज्ञानिक व्दय डॉ.सोम शंकर दुबे गोरखपुर एवं डॉ प्रेम शंकर दुबे वाराणसी 

प्रदुषण कुछ कह और आगाह कर रहा है। क्या हमारे पास कुछ समय है देखने की ?समाचार पत्रों में जौनपुर में टायर गोदाम में आग और काले धुआं का बादल उठता दिख रहा है।मार्गों पर जहां भी देखिये कला धुआं दिखता है। लोंगो को साँस लेने में कठिनाई आ रही है साथ ही खांसी भी पस्त कर रही है।हम यहाँ पर इसके कारणों पर विचार करेंगे जैसा कि सभी जानते है अब शीत ऋतु प्रारंभ हो चुकी है तो वायु ठंडी होने पर भारी होकर जमीन की और झुक जाती है और उसमें जो भी धुल आदि जो मोटर, ट्रक, ट्रैक्टर आदि के चलने से उत्पन्न हो रही है वह जमीन की सतह पर ही रह जा रही है. यह एक धुंध बन रहा है और इधर वृक्षों की लगातार काटने से वायु में आक्सीजन कम हो रही है।

 

यहाँ विचार यह करना है कि क्या मनुष्य बिना आक्सीजन जीवित रह सकता है?यदि नहीं तो इस भयानक स्थिति से बचने का क्या उपाय हो?ऐसे में एक ही विकल्प रह जाता है कि वाहनो का चलना बंद हो!यह कार्य सिर्फ सरकार ही कर सकती है।सरकार इस विषय पर सोचें ?

हालांकी यह काम बड़ी आसानी से सिर्फ पेट्रोल पम्पो को तत्काल बंद कर किया जा सकता है और न होने पर इसके भयंकर परिणाम दिख सकते हैं।

जैसा की सभी यह जानते है कि अभी कुछ ही समय पहले कोरोना बीमारी के दौर में सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं आक्सीजन के न मिलने से हुई और भारत सरकार के सभी प्रयास आक्सीजन पैदा करने और सिलिंडर भरने का फेल सिर्फ इस लिए हो गया की हमारे वायुमंडल में आक्सीजन कम था. सब के बावजूद थोडा वृक्षरोपण हुआ भी फिरभी वायु की गुणवत्ता सुधरी नहीं है. यह हमारे पर्यावरण की चुनौती है। जहां तक हमारी विज्ञान की जानकारी है उसके अनुसार आक्सीजन किसी भी प्रकार प्रचुर मात्रा में उत्पन्न नहीं की जा सकती है।एक बात और यहां कह देना आवश्यक प्रतीत होता है आज हमारे पास ऐसे उपकरण भी और उनके बनाने वाले जानकार भी बहुत कम है जो वायु में उपलब्ध आक्सीजन की मात्रा नापकर बता सकें। किसी स्थान पर कितनी आक्सीजन कम या अधिक है?

 

सच्चाई यह है कि सरकार की संरचना ही कुछ इस प्रकार की है कि वहां जेनरलिस्त (अर्थात हिंदी, समाज शास्त्र, भूगोल, दर्शन शास्त्र, राजनीती शास्त्र के विषय ज्ञान वाले अधिकारी) तो बहुत हैं परन्तु वैज्ञानिक कितने है। कुछ पता नहीं. यह एक स्वयं में गंभीर और विचारनीय स्थिति है. इस प्रकार की दयनीय स्थिति से जनता स्वयं निपटे अन्यथा कहना मुश्किल है।

समाचारों के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली में प्रदुषण सीमा से अधिक हो गया है जो कठिनाई पैदा कर रहा है. आज के दिन वहां पर एक मैच दो विदेशी खिलाड़ियों के साथ होना था जिसे उन खिलाड़ियों ने खेलने से इनकार कर दिया है और कहा दिया कि हमलोग ऐसे प्रदूषित वातावरण में नहीं खेल सकते!

 

यह परिस्थितियां कुछ तो कह रही है, क्या कोई सुनेगा और सामान्य जन के जीवन के हेतु कुछ होगा!!

 

(लेखकगण के अपने विचार हैं)

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