
वाराणसी। अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम (पड़ाव) में परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम की 88वीं जयंती पर आयोजित गोष्ठी में पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम ने कहा कि सुनने का महत्व तभी है जब हम उसका चिंतन-मनन कर उस पर चलने का प्रयत्न करें। प्रयत्न ही पुरुषार्थ है। यदि हम प्रयत्नशील होंगे तो वह पुरुषार्थ हममें आएगा। अभी अशोक जी द्वारा लिखित जिस पुस्तक का विमोचन हुआ। बहुत ही सुंदर तरीके से और बहुत ही आकर्षक तरीके से इन्होंने लिखा है। परमपूज्य अघोरेश्वर के बाल्यकाल से उनका जीवनवृत्त उन्होंने इस तरह खींचा है कि पढ़ना चालू करने पर छोड़ने का मन भी नहीं करता। उसमें कई संस्मरण दिए हुए हैं जो बहुत ही अनुकरणीय हैं और उसमें यह भी एक है कि यदि आप उन अघोरेश्वर को सच्चे मन से याद करेंगे। अपने पास महसूस करेंगे तो हमें वह मदद जरूर मिलेगी। यदि सही मायने में उनकी वाणियों पर, उनके आदर्शों पर, उनके आचरण पर अपना व्यवहार करने लगेंगे, चलने लगेंगे तो हमें किसी और चीज की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। कहा कि अपनी ग्रंथावली में भी जिक्र है कि जब सृष्टि की रचना हुई तो सब जगह जल ही जल था और जब ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए तो उन्होंने देखा कि दो बड़े-बड़े राक्षस लड़ते हुए दौड़ते आ रहे हैं उनको मारने के लिए। वह भयभीत होकर कमल-नाल में प्रवेश कर सागर में चले गए। सागर की गहराई में जाकर उन्होंने देखा विष्णु जी सोये हुए हैं। उन्होंने लक्ष्मी जी से प्रार्थना किया कि उनको आप जागृत कीजिये। विष्णु जी ने उन दोनों राक्षसों को मारकर उनकी रक्षा की। ऐसे ही बंधुओं! हमारे शरीर को वस्त्र ढँकता है और इसके अंदर हमारा शरीर रहता है और उसके अन्दर हमारी आत्मा निवास करती है और जिसे हमने गहरी नींद में सुला रखा है। उसी को चैतन्य करने के लिए हमें उस तक पहुँचना है। किसी संत से एक व्यक्ति ने पूछा कि महाराज ईश्वर को प्राप्त करने का रास्ता क्या है? उन्होंने कहा- देखो जो ईश्वर द्वारा प्राण प्रतिष्ठित मनुष्य है उनकी आप सेवा करेंगे, मदद करेंगे, उनको ऊपर उठाएंगे, तो यह ईश्वर के करीब जाने का तरीका है। सेवा से हमलोग उसके निकट तक जा सकते हैं। फिर हमें गुरु की आवश्यकता होती है, उनके सान्निध्य की, उनके आशीर्वाद की, उनके छाया की आवश्यकता होती है। परमपूज्य अघोरेश्वर ने कहा था कि मैं शरीर में नहीं रहूँगा तो आप लोगों के और करीब रहूँगा। बातों को सुनने का महत्व तभी है जब उसका हम चिंतन मनन कर उस पर चलने का प्रयत्न करें। क्योंकि प्रयत्न ही पुरुषार्थ है। यदि हम प्रयत्नशील होंगे तो वह पुरुषार्थ हममें आएगा और हम धीरे-धीरे वहाँ तक पहुँच सकते हैं। अपनी आत्मा को चैतन्य कर सकते हैं, आत्मा की आवाज को भी सुन सकते हैं। जो स्थिर चित्त होंगे, जो ध्यान-धारणा करते होंगे, जिनके अंदर अटूट विश्वास है वे उस चीज को महसूस करते होंगे कि कोई काम करने जा रहे हैं तो अचानक आता है कि नहीं वहां नहीं जाना, वह नहीं करना है। लेकिन फिर वह अपने मन के द्वारा संचालित होने लगते हैं। आत्मा के आवाज की अनदेखी कर देते हैं और अनेक कष्ट भोगते हैं। जितना अधिक लगाव रहेगा जिससे रहेगा वही कष्ट है और वही कष्ट देते हैं, चाहे अपने व्यवहार से दें चाहे जैसे। दिन छोटे होते हैं तो मां-बाप कितने प्रेम से अपने बालकों को रखते हैं रात रात भर जागना भी पड़ता है सब कुछ करते हैं बड़े होने पर यह जो समाज है और यह शिक्षण संस्थाएं हैं वह यह सब नहीं सिखाती हैं, ना वहाँ कुछ बताया जाता है, पहले वाला समय भी नहीं है, केवल कैसे अर्थ को अर्जित किया जाय यही समझाया जाता है। इसके चलते हमलोगों की जो पीढ़ी है जो आ रही है उनका दिमाग ही उस तरफ नहीं है। ऐसी स्थिति हो गई है आज के समय में कि किसी को कुछ कहिए तो समझता ही नहीं है। कुछ पूछिए तो कुछ-का-कुछ उत्तर देता है। आप देखे होंगे कई जो हमारे सैनिक हैं वह अपने देश को आतंकियों से बचाने में बहुत कम उम्र में अपनी जान भी दे देते हैं, अपने राष्ट्र के लिए, आप-हम सभी के लिए अपनी जान भी दे देते हैं। तो उनमें क्या प्रेरणा रही होगी कि वो इतने कम उम्र में अपनी जान तक देने को तैयार होते हैं। यह पहले हमारे इतिहास में भी रहा है। लेकिन हम लोग मरने से डरते हैं। इसलिए डरते हैं कि हमको ना किसी पर विश्वास है, न किसी पर भरोसा है, न ही किसी को हम मानते हैं। मुंह से कह देते हैं कि हम मानते हैं, जानते हैं। हमारे शरीर को कोई भले कष्ट दे दे, हमारी शरीर को काट दे, जला दे, कुछ भी कर दे, लेकिन हमारी आत्मा का वह कुछ नहीं कर सकता। हम कौन हैं? मैं वही आत्मा हूँ जिसको कोई कुछ नहीं कर सकता है। वह रहेगा ही, है और रहेगा। इतना भी यदि हमें ज्ञान हो जाता है तो हमलोग गलत कृत्यों को करने की तरफ बिल्कुल नहीं जाते हैं। गोष्ठी में पूज्यपाद बाबा के कर-कमलों से गाजीपुर भुड़कुड़ा पीजी कालेज के पूर्व प्रवक्ता डॉ अशोक कुमार सिंह के अघोरेश्वर महाप्रभु के ऊपर लिखित उपन्यास ‘फकीर की लकीर’ का लोकार्पण हुआ। गोष्ठी के यूपी कॉलेज के अवकाशप्राप्त विभागाध्यक्ष (हिंदी) साहित्यकार डॉ रामसुधार सिंह,उपन्यास के लेखक डॉ अशोक कुमार सिंह, भोलानाथ त्रिपाठी, अघोर शोध संस्थान के निदेशक डॉ अशोक कुमार सिंह, शशि गुप्ता, एसपी यादव, पलामू ग्रोमिको ने विचार व्यक्त किया। धन्यवाद ज्ञापन पारस नाथ यादव ने किया।
