
वाराणसी। बुधवार को व्यास पूर्णिमा के पवित्र दिवस पर रामनगर दुर्ग में स्थित दिव्य स्थान पर जहां बदरायण वेदव्यास जी ने वेदांग समेत चारों वेदों के विभाग किया ।
18 महापुराणों की रचना की है वहां अथर्ववेद की शौनक शाखा का कंठस्थ एकाकी वक्ता श्रोता विधि से परायण संपन्न हुआ। अथर्ववेद मूल संहिता जिसमें 5977 मंत्र हैं, गोपथ ब्राह्मण जिसमें 258 खंड है, प्रश्नोपनिषद जिसमें सात खंड है। मुंडकोपनिषद जिसमें सात खंड हैं एवं मांडूक्योपनिषद जिसमें तीन खंड हैं का पारायण बिना किसी पुस्तक के किया गया ।महाराष्ट्र के पुणे एवं नांदेड़ से आए हुए वैदिक विद्वान पद्मनाभ विवेक जोशी वक्ता एवं श्रोता वेदांत विजय कुमार जोशी रहे। इस दिव्य स्थान की महिमा को जानकर इस दिव्य स्थान के चारों तरफ महाराजा बलवंत सिंह द्वारा दुर्ग का निर्माण करवा कर इस दिव्य स्थान की सुरक्षा सुनिश्चित की गई।
इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुनः काष्ठजीह्वा स्वामी जी के दिशा निर्देशन में हुआ। इस स्थान पर वेदव्यास जी को साक्षी मानकर वेद पारायण की प्राचीन परंपरा रही जो कि महाराज आदित्य नारायण सिंह जी के आसमय देहावसान के कारण खंडित हो गई परंतु महाराज विभूति नारायण सिंह शर्मदेव द्वारा यह परंपरा जीवित की गई और उनके पश्चात महाराज कुमारी विष्णु प्रिया जी द्वारा यह परंपरा चलाई जा रही है। एकाकी वक्ता श्रोता द्वारा वेद पारायण किया जाना अत्यंत कठिन है क्योंकि इसमें वक्ता के ज्ञान की ही नहीं वरन आत्मविश्वास की भी परीक्षा होती है। 70 वर्षीया यह परंपरा काशी का गौरव है और वेदों के संरक्षण के लिए एक बहुत बड़ा योगदान है। यह वेद परायण ही वेदव्यास जी के जन्म दिवस के अवसर पर उनके प्रति की जाने वाली वास्तविक पूजा अर्चना है।
