
पांडुलिपियों को डिजिटल तकनीक के माध्यम से ज़न सुलभ बनाये जाने की जरूरत- कुलसचिव

वाराणसी।”योजकस्तत्र दुर्लभः” का अर्थ है कि जो दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण में लगे हुए हैं, वे वास्तव में एक महान कार्य कर रहे हैं। यह कार्य न केवल भारतीय संस्कृति और ज्ञान के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह माँ भारती के प्रति समर्पित पूजा करने का तुल्य भी है।उक्त विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने सोमवार को योग साधना केन्द्र में आज से प्रारम्भ हुये संस्कृत विश्वविद्यालय एवं ज्ञान भारतम( राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन,संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय कार्यशाला ( मेटाडेटा निर्माण और पांडुलिपि संरक्षण कार्यशाला)का उद्घाटन करते हुए बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किया।
कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण का कार्य किया जा रहा है, जिसमें लगभग 96 हजार पांडुलिपियों का संरक्षण किया जा रहा है। यह कार्य न केवल भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह विश्व के लिए भी एक महत्वपूर्ण कार्य है।
कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि यह कार्य मां भारती की सेवा के लिए तथा भारत एवं भारतीयता के उत्थान के लिए कार्य किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस कार्य में लगभग 60 हजार फोलियो के कार्य किये जा चुके हैं, किन्तु इस कार्य को तिगुनी गति से करने की जरूरत है। इसके लिए 50 आदमी और बढ़ाकर कार्य की गति बढ़ाकर संरक्षण किया जाए, आज भारत सरकार ने वित्तीय सहायता किया है।
सारस्वत अतिथि कुलसचिव राकेश कुमार ने बताया कि दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण दुर्लभ कार्य है इसे संरक्षित करने के लिए समर्पित भाव का होना जरूरी है।इसमे भारतीय संस्कृति एवं परंपरा का सम्पूर्ण भाव निहित है।अनेकों आक्रमण होने बावजूद भी हमारे ज्ञान इन पांडुलिपियों में संरक्षित हैं।आज इन पांडुलिपियों को डिजिटल तकनीक के के माध्यम से ज़न सुलभ बनाये जाने की जरूरत है,साथ ही शोध कार्य करने से व्यापकता में वृद्धि होगी।
प्राचीन विधियों का प्रयोग कर संरक्षण को गति दिया जाएगा–
बतौर विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय साँस्कृतिक सम्पदा संरक्षण अनुसंधान शाला (लखनऊ) के पूर्व वरिष्ठ संरक्षक डॉ प्रमोद कुमार पाण्डेय ने इस संरक्षण कार्यशाला में पांडुलिपि को संरक्षित करने के लिए विभिन्न विकृतियों के बारे में जानकारी दिया।इसको कैसे दूर किया जाए तथा प्राचीन विधियों का प्रयोग (लौंग कपूर के मिश्रण से) करके संरक्षित किये जाने पर विचार दिया।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्वलन एवं मां सरस्वती के प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया।
पुस्तकालय अध्यक्ष प्रो राजनाथ ने अतिथियों को पुष्प गुच्छ एवं अंग वस्त्र ओढ़ाकर स्वागत और अभिनंदन करते हुए पांडुलिपि संरक्षण के संबंध में सम्पूर्ण विषय पर प्रकाश डाला।
इस कार्यक्रम की संयोजिका डॉ विभा पाण्डेय ने सभी विषयों को विस्तार से बताया कि इस कार्य को कैसे गति देना है।
धन्यवाद ज्ञापन डॉ शिशिर ने किया है।
उक्त अवसर पर डॉ विभा पाण्डेय, डॉ शिशिर,जितेन्द्र कुमार सिंह, सुशील कुमार तिवारी सहित कार्यशाला में सहभागी उपस्थित थे।
