वाराणसी। जैतपुरा स्थित अखिल भारतीय सनातन न्यास, द्वारा आयोजित रामकथा के सातवें दिवस प्रवचन करते हुए पातालपुरी पीठाधीश्वर बालक देवाचार्य जी महाराज ने कहा कि महाराज दशरथ जी ने बार-बार कैकेई को समझाया कि यदि तुम चाहती हो कि भरत राजा हो जाए, तो तुम्हारा यह वचन मान सकता हूं, लेकिन राम को वनवास मत मांगो जिस पर कैकई नहीं मानी। तब राजा दशरथ ने प्रभु राम को बड़े ही दुखी मन से वन जाने की बात बताई। प्रभु राम पिता की आज्ञा पाकर हंसी-खुशी वन जाने को तैयार हो गए। उनके साथ माता सीता भी रानियों के लाख समझाने से नहीं मानीं तथा उनके साथ लक्ष्मण जी भी राजा का आज्ञा पाकर आर्य सुमन्त ने रथ पर बैठकर तीनों लोग वन गमन को प्रस्थान कर गए। रास्ते में प्रभु ने ऋषि मुनियों को दंडवत प्रणाम करते हुए आगे चले जा रहे हैं। इधर राजा दशरथ, राम के वियोग में स्वर्ग सिधार गए। तब गुरु वशिष्ठ ने दूतों को भेज कर तुरंत भरत – शत्रुघ्न को ननिहाल से अयोध्या वापस बुलाने के लिए कहा। जब भरत शत्रुघ्न ननिहाल से अयोध्या को लौटे तो राजा का स्वर्गवासी होना सुनकर अति दुखी हुए। तब गुरु वशिष्ठ ने राजा का अंतिम संस्कार बड़े ही सात्विक रीति रिवाज से संपन्न कराया। तब भरत जी ने पूरे अयोध्या वासियों, रानियों तथा राजा जनक जी के नेतृत्व में कामदगिरि पर्वत पर जहां प्रभु ठहरे थे, वहां जाकर काफी मान मनौव्वल किया, परंतु शास्त्र की बात को समझाते हुए उन्हें भरत जी को अपनी चरण पादुका दे दिया जिसे सर पर धारण करके भरत जी की अयोध्या को लौट चले। उस चरण पादुका को राज सिंहासन पर उसकी आज्ञा के अनुसार राज्य का संचालन उन्होंने 14 वर्ष तक किया।

वक्ता, सुप्रसिद्ध कथा वाचक पंडित वेद प्रकाश मिश्रा कलाधर ने भी मानस पाठ किया।

मंच का संचालन प्रधान सचिव राजेश सेठ ने किया।

इस अवसर पर आयुष राज्यमंत्री डॉ दयाशंकर मिश्र दयालु, पूर्व महापौर मृदुला जायसवाल, अरविंद वर्मा, जय शंकर गुप्ता, जग नारायण गुप्ता, भैया लाल, विष्णु गुप्ता, असीम जायसवाल, रवि प्रकाश, विनीत कुमार, राजेंद्र कुमार, संजय महाराज, वतन कुमार, किशोर सेठ ने व्यास पीठ की आरती उतारी।

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