
गांव के विद्यालय बच्चों के लिए शिक्षा का मुख्य साधन होते हैं, खासकर उन परिवारों के लिए जो शहरों में जाकर पढ़ाई कराने में सक्षम नहीं होते। विद्यालय केवल पढ़ाई का स्थान नहीं है, बल्कि बच्चों के समग्र विकास, सामाजिक समझ और आत्मनिर्भरता का बहुत सशक्त माध्यम भी होता है।
यहाँ कुछ प्रमुख कारण हैं कि गांव के विद्यालय क्यों बंद नहीं होने चाहिए:
1. सभी बच्चों को समान शिक्षा का अधिकार है
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम कहता है कि 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा मिलनी चाहिए। अगर गांवों में विद्यालय नहीं होंगे, तो ये अधिकार अधूरा रह जाएगा।
2. गांव के बच्चों को शहर भेजना परिस्थितिनुसार संभव नहीं होता।
हर परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होता कि वे अपने बच्चों को दूर शहरों में पढ़ा सकें। गांव में विद्यालय होने से उन्हें घर के पास ही पढ़ने का अवसर मिलता है।
3. विद्यालय सामाजिक बदलाव का बहुत बड़ा माध्यम हैं।
गांव के विद्यालयों में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों में जागरूकता, स्वच्छता, समानता, और नागरिक जिम्मेदारियों की भावना भी विकसित होती है।
4. बालिकाओं की शिक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
गांव के विद्यालय बंद होने पर लड़कियों की शिक्षा पर सबसे खराब असर पड़ेगा, क्योंकि अक्सर माता-पिता उन्हें दूर भेजने में असहज महसूस करते हैं।
5. स्थानीय रोजगार और विकास रुक जाएगा।
गांव में विद्यालय होने से शिक्षकों, सहायकों और अन्य कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलता है। ये विद्यालय ग्रामीण विकास में भी योगदान देते हैं।
निष्कर्ष:-
गांव के विद्यालय बंद करने की बजाय उन्हें बेहतर बनाना चाहिए — जैसे शिक्षक प्रशिक्षण, बेहतर आधारभूत सुविधाएं, डिजिटल शिक्षा, पुस्तकालय और खेल सामग्री प्रदान करना। इससे गांव के बच्चों को भी बराबरी का अवसर मिलेगा और देश का समग्र विकास होगा।
लेखिका कल्पना तिवारी शिक्षिका
