राम से बडा राम का नाम,इसको नित्य जपने से सभी अवरुद्ध मार्ग खुल जाता है

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सुनी कथा, भक्तों को दिया आशीर्वचन

 

रिपोर्ट अनुपम भट्टाचार्य 

 

वाराणसी। स्व. चल्ला कृष्ण शास्त्री जी के पुण्य स्मृति में सोनारपुरा स्थित श्री श्री चिंतामणि गणेश मंदिर में सप्त दिवसीय संगीतमय श्रीरामचरितमानस कथा व्यास नीलमणि दीदी लक्ष्मी बड़ी दीदी के मुखारविंद से श्रीरामचरित मानस कथाप्रसंग के छठवें दिन कथा व्यास लक्ष्मी मणिशास्त्री जी ने रामचंद्र जी के विवाहों -परांत बारात एक वर्ष तक राजा दशरथ सहित जनकपुरी में ही राजा जनक जी के द्वारा रोके जाने के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया तथा राजा जनक जी द्वारा विवाह में दिए गये उपहार को राजा दशरथ जी ने विवाह स्थल व जनवासा स्थल तक सभी उपहार को बांट दिया किंतु जब पुनः एक वर्ष पश्चात गुरु के आज्ञानुसार बरात की विदाई हुई तो राजा जनक जी ने दोबारा उपहार देकर राजा दशरथ के बारात को विदा किया और बारात से पहले ही उपहार अयोध्या नगरी पहुंचा दिए।

कथा व्यास ने किशोरी जी के विदाई के प्रसंग में बताया कि विदाई के समय किशोरी जी ने जो तोता मैना पाल रखा था। वो सब भी राजा जनक जी व परिवार के विरह में शामिल हुए व विलाप करने लगे।माता कौशल्या जी ने बहू के स्वागत में पुरजोर तैयारी की। बहू को सुकुमोल जानकर अयोध्या पहुंचने पर खूब स्वागत किया तत्पश्चात रामजी के राज्याधिभिषेक के लिए प्रजा सहित सभी लोगों ने अपनी स्वीकृति प्रदान की। किंतु मथंरा के कानों में जब राम राज्याभिषेक की आवाज़ सुनाई पड़ी तो तुरन्त महल में कैकेयी के पास जा कर बोली, अरे राम का राज्याभिषेक होने जा रहा है और तुमको मालूम नहीं, हमारे भरत का राज्याभिषेक नहीं होगा। इस प्रकार मंथरा ने कैकेयी को ऐसा समझा दिया कि कैकेयी कोप भवन में चली गई। जब राजा दशरथ को मालूम हुआ कि रानी कैकयी नाराज हो गई है खाना-पीना नहीं खाया। तब दशरथ जी कैकेई के पास गये और नाराजगी का कारण पूछा तो कैकेई ने भरत को राज्य व राम को 14 वर्ष का वनवास के लिए कहा जिससे राजा दशरथ मूर्छित हो गए। लेकिन राम ने कैकई माता के वचन को सहर्ष स्वीकार किया व वन जाने को लिए तैयार हो गए। साथ में सीता व लक्ष्मण जी भी जिद्द करके साथ हो लिए। राम के वनगमन के पश्चात् केवट, सीताहरण जटायु प्रसंग, सुग्रीव बाली प्रसंग, हनुमान प्रसंग, समुद्र में विनती का प्रसंग एवं समुद्र में वानर आदि से पुल निर्माण का प्रसंग एवं समुद्र पर पुल निर्माण के रामजी द्वारा शिव की स्तुति एवं हनुमानजी द्वारा सीता के साथ अशोक वाटिका का प्रसंग व हनुमानजी द्वारा लंका दहन, विभीषण का राम जी के साथ मिलना, राम द्वारा रावण का अंत एवं विभीषण का लंका में राज्याभिषेक व राम का अयोध्या वापस लौटकर राम का राज्याभिषेक का वर्णन किया।

कथा व्यास लक्ष्मीमणि शास्त्री ने कहा कि राम से बडा राम का नाम को नित्य जपने से सभी अवरुद्ध मार्ग खुल जाता है।

तत्पश्चात शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द जी का कथा में आगमन व उनका आशीर्वचन हुआ। महंत चल्ला सुब्बा राव ने स्वामी जी को अंगवस्त्रम ओढाकर व चिंतामणि गणेश का चित्र भेटकर स्वागत किया।

कथा में मुख्य रुप से महंत चल्ला सुब्बा राव, चल्ला अन्नपूर्णा प्रसाद, संतोष सोलापुरकर, मीना चौबे, चल्ला गणेश, नरेंद्र ओझा, सतीश चंद्र मिश्रा, कुमार, दिव्या, साक्षी, निशिता, ओम प्रकाश मिश्रा आदि उपस्थित रहे।

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