
वाराणसी। हिंदी कथा-साहित्य के यथार्थवादी परंपरा के अग्रदूत मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘मांगे की घड़ी’ आज भी समाज के मध्यवर्गीय चरित्र और मानसिक द्वंद्व को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है। यह विचार प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र लमही द्वारा सुनो मैं प्रेमचंद के 1784वें दिवस पर डा. राम सुधार सिंह ने व्यक्त किए। डा. राम सुधार सिंह ने कहा कि यह कहानी उस दौर की सामाजिक स्थिति को प्रतिबिंबित करती है, जब घड़ी, वस्त्र और आचरण जैसे आधुनिकता के प्रतीक व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का मानक बनते जा रहे थे। सीमित आय वाला मध्यम वर्ग सामाजिक प्रतिष्ठा की होड़ में अपने साधनों से अधिक दिखने का प्रयास करता था। प्रेमचंद ने ‘मांगे की घड़ी’ के माध्यम से इसी दिखावटी प्रवृत्ति, आत्मसम्मान और नैतिक द्वंद्व को अत्यंत सशक्त ढंग से सामने रखा है। इस अवसर पर प्रो श्रद्धानंद ने प्रेमचंद की कथा-दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे मानवीय कमजोरियों को अत्यंत सहज और प्रभावशाली ढंग से चित्रित करते हैं। कहानी का पाठ प्रो इति अधिकारी ने किया। पवन वर्मा और विराज दूबे प्रेमचंद मित्र से सम्मानित किए गए। इस अवसर पर डा. महेंद्र प्रताप सिंह, कंचन सिंह परिहार, डा. शरद श्रीवास्तव,टीका राम आचार्य, मृत्युंजय मिश्रा आदि थे। संचालन प्रांजल श्रीवास्तव,स्वागत संतोष श्रीवास्तव,धन्यवाद ज्ञापन डा. महेंद्र प्रताप सिंह ने किया।
