
वाराणसी। विद्याश्री न्यास, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, साहित्यिक संघ, मां भवानी महाविद्यालय और लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय, दीन दयाल नगर के संयुक्त तत्वाधान में पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शती के अवसर पर उनके रचना-कर्म पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन समारोह बड़े गौरवपूर्ण रूप में संपन्न हुआ।
समापन सत्र में मुख्य रूप से डा. रामसुधार सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र की संपादन कला अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि पंडित जी के संपादन कार्य में संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी और जनपदीय भाषाओं का समन्वय उनके क्षितिज विस्तार का परिचायक है। नवभारत टाइम्स, साहित्य अमृत और विभिन्न साहित्यिक कोशों के संपादन से उनकी संपादकीय कुशलता सभी के लिए प्रेरणादायक है।
प्रो हीरामन तिवारी (जेएनयू) ने पंडित जी के चिन्तन का विश्लेषण करते हुए कहा कि उनका दर्शन इस बात पर आधारित था कि लोक और शास्त्र का विभेद तभी समझा जा सकता है जब हमारी संस्कृति की उस क्षमता को परखा जाए जिसमें ग्रहण और परित्याग की भावना एकसाथ प्रतिफलित होती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो राकेश उपाध्याय ने कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र केवल एक साहित्यकार या शिक्षाविद् ही नहीं थे, बल्कि लोकधर्मी रचनाकार और भावों के व्याख्याकार भी थे। 1990 के दशक में नवभारत टाइम्स को नया तेवर देने के साथ उन्होंने पत्रकारिता में लोक केंद्रित कई नवीन शब्दों को प्रचलित किया। उनका साहित्य आज भी भारत की निरंतर सृजन शक्ति का परिचायक है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य और संस्कृति के प्रस्थानत्रयी में पंडित विद्यानिवास मिश्र, प्रो वासुदेव शरण और प्रो बलदेव उपाध्याय प्रमुख हैं।
मुख्य अतिथि प्रो पृथ्वीश पाण्डेय ने कहा कि पंडित जी ने प्रशासन में काशी विद्यापीठ और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का चतुर्भुजी विकास किया और काशी विद्यापीठ में नए संकाय व विषयों की शुरुआत की। उन्होंने पाणिनी के व्याकरण तकनीक की भी विशद व्याख्या की।
सारस्वत अतिथि डा. दयाशंकर मिश्र दयालु, माननीय मंत्री, उत्तर प्रदेश शासन ने कहा कि पंडित जी का रचनात्मक संसार अत्यंत विस्तृत है। विद्याश्री न्यास द्वारा उनके जन्मदिन पर आयोजित साहित्य उत्सव ने पूरे भारत के साहित्य जगत को एक मंच पर जोड़कर रखा है। उन्होंने कहा कि पंडित जी ने भारतीय यथार्थ को अपनी लेखनी में सजीव किया और उनके निबंधों में धर्म, दर्शन, इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और मानवीय दृष्टिकोण प्रमुखता रखते थे।
सारस्वत अतिथि पद्मश्री राजेश्वर उपाध्याय ने विद्यानिवास मिश्र की किताब ‘सपने कहाँ गए’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह किताब आजादी और उसके बाद के प्रमुख विषयों पर गंभीर सवाल उठाती है। उन्होंने बताया कि पंडित जी का मन हमेशा भारतवर्ष की श्रेष्ठता और संस्कृति के मूल विकास की ओर आकर्षित रहता था।
डॉ. हरेन्द्र प्रताप सिंह (दिल्ली), जो नवभारत टाइम्स में पंडित जी के पूर्व सहयोगी थे, ने कहा कि पंडित जी ने पत्रकारिता में भारतीयता और लोक-संस्कृति को स्थापित किया। वे सभी विचारधाराओं को साथ लेकर चलने वाले समावेशी संपादक थे। उनके संपादन में नवभारत टाइम्स एक ऐसा मंच बन गया जहाँ दक्षिणपंथ, वामपंथ और मध्यमार्गी विचारों को समान स्थान मिला।
इस सत्र में डा. प्रतिभा और डा. अंकिता ने भी अपने विचार साझा किए। समापन सत्र का संचालन प्रो प्रकाश उदय ने किया और धन्यवाद ज्ञापन साहित्यिक संघ के डा. नरेन्द्रनाथ मिश्र ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में विद्यानिवास मिश्र जन्मशती पुरस्कार निम्नलिखित मनीषियों को प्रदान किया गया:
डा. सुनील विश्वकर्मा
मनीष खत्री
ज्ञानेश्वर नाथ
कथाकार मुक्ता जी
ब्रजेन्द्र नारायण
कवीन्द्र नारायण
कंचन परिहार
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित थे: प्रो प्रदीप कुमार पांडेय, प्रो धर्मेन्द्र, डा आलोक सिंह, डा दिनेश साहू, वंदना ओझा, प्रो विजय कुमार, प्रो संजय, प्रो अमित, प्रो अरुण, प्रो इशरत, डा गुलजबी, श्री व्रजेश, विवेक, डा हेमंत, डा सुजीत, डा दीपक, डा अरविंद, डा प्रजापति, डा नवीन कुमार, विजयलक्ष्मी, डा साधना, डा सारिका, डा पूनम, डा सीता, डा सविता, डा आशुतोष, डा राजेश, डा पंकज, डा ध्रुवनारायण, डा अशोकनाथ, डा धीरेन्द्र, डा सत्येंद्र, डा विमर्श, सुद्धन, शशिशेखर, आनंदप्रिया, अरविंद चौधरी, अभिषेक, राजमंगल, सत्येंद्र, सुरेंद्र, राहुल, विवेक, आदि।
इस प्रकार, राष्ट्रीय संगोष्ठी ने पंडित विद्यानिवास मिश्र के संपादन, साहित्य और पत्रकारिता में योगदान को यादगार तरीके से उजागर किया और उनके जीवन और रचना-कर्म को साहित्य जगत के लिए अनमोल प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया।
