वर्तमान समय में रटने की प्रवृत्ति में कमी आ रही है

अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र में पांच दिवसीय आनलाइन कार्यशाला 

 

वाराणसी । अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी में “इंटीग्रेटिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन लाइफ साइंसेज़ टीचिंग एंड लर्निंग” विषय पर पांच दिवसीय ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है।

यह कार्यक्रम प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी तथा प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान), आईयूसीटीई, वाराणसी के निर्देशन में आयोजित किया जा रहा है।

दूसरे दिन के प्रथम वक्ता प्रो. विशाल श्रीवास्तव, थापर विश्वविद्यालय, पटियाला ने “ए.आई. इन लाइफ साइंसेज रिसर्च एंड एजुकेशन” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आज केवल एक कंप्यूटर टूल नहीं, बल्कि चिकित्सा और जैव-विज्ञान के क्षेत्र में एक डिजिटल वैज्ञानिक की भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि दवा अनुसंधान में जो कार्य पहले लगभग दस वर्षों में पूरा होता था, वह अब एआई आधारित वर्चुअल स्क्रीनिंग और डेटा प्रोसेसिंग की सहायता से कुछ ही महीनों में संभव हो रहा है।

द्वितीय सत्र में डॉ. विनोद सिंह गौर, सहायक प्राध्यापक, आरआईई, मैसूर ने “एआई फॉर स्टूडेंट एंगेजमेंट एंड पर्सनलाइज़्ड लर्निंग” विषय पर व्याख्यान दिया।

उन्होंने बताया कि जटिल वैज्ञानिक सिद्धांतों को सरल बनाने के लिए आधुनिक एआई टूल्स का व्यापक स्तर पर उपयोग किया जा रहा है। इन उपकरणों की सहायता से शिक्षक छात्रों को डीएनए संरचना, कोशिकीय जीवविज्ञान तथा मानव शरीर के जटिल सिद्धांतों को त्रिआयामी (3D) और दृश्यात्मक तरीकों से सरलता से समझा पा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह तकनीक विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता के अनुसार शिक्षण प्रक्रिया को अनुकूलित करती है, जिससे रटने की प्रवृत्ति में कमी आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षण में एआई टूल्स का समावेश न केवल शिक्षकों का समय बचा रहा है, बल्कि अधिगम प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी और रोचक बना रहा है।

इस पाँच दिवसीय कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागी सहभागिता कर रहे हैं। इस कार्यशाला की संयोजिका डॉ. कुशाग्री सिंह, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई, वाराणसी हैं।

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