श्रीकृष्ण का अवतरण धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का दिव्य संदेश :-प्रो. सुधाकर मिश्र

 

 

वाराणसी।सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव पर वाग्देवी मन्दिर परिसर में जन्म महोत्सव धूम धाम से मनाया गया।

इस महापर्व पर संस्था के वरिष्ठ आचार्य एवं दर्शन संकाय प्रमुख प्रो रजनीश कुमार शुक्ल ने श्री कृष्ण भगवान जी के विभिन्न पक्षोंका वर्णन करते हुए बताया कि श्रीकृष्ण जी देवकी और वासुदेव के 8वें पुत्र थे। मथुरा नगरी का राजा कंस था, जो कि बहुत अत्याचारी था। उसके अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे।उनका वध कर असत्य और अन्याय का शमन किया.यह महापर्व अन्याय,अहंकार एवं अत्याचार को शमन करने का है।

 

प्रो शुक्ल ने कहा कि जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के अवतार और उनके जीवन की महिमा को स्मरण कराता है। भगवान कृष्ण एक आदर्श व्यक्तित्व हैं जिनके जीवन की कथाएं और संदेश हमें भक्ति, प्रेम, धर्म और सच्चे जीवन के मूल्यों को सिखाते हैं। जन्माष्टमी इस महान आदर्श की स्मृति को जीवित रखने का अवसर प्रदान करता है।

 

प्रो महेन्द्र पांडेय ने कहा कि जन्माष्टमी भगवान कृष्ण की भक्ति और आराधना का महान अवसर है। भक्तजन इस दिन उनके चरणों में फूल, फल, सुपारी, धूप, दीप आदि से पूजा-अर्चना करते हैं और उनके नाम के जप और कीर्तन करते हैं। यह त्योहार भक्ति, प्रेम और आराधना की भावना को जगाने का अवसर प्रदान करता है।

 

वेदांत के आचार्य प्रो सुधाकर मिश्र ने व्यास पीठ से भगवान श्री कृष्ण जी की कथा सुनाते हुए कहा कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर आयोजित धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में व्यास पीठ से प्रो. सुधाकर मिश्र ने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन-दर्शन और उनके दिव्य संदेश पर सारगर्भित उद्बोधन दिया।

उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का अवतरण केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, प्रेम और लोककल्याण की स्थापना का दिव्य संदेश है। जब-जब समाज में अधर्म और अन्याय बढ़ता है, तब धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ईश्वरीय शक्ति का प्राकट्य होता है।

प्रो. मिश्र ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन और श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से मानवता को कर्म, कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि गीता का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि श्रीकृष्ण ने मनुष्य को परिस्थितियों से विचलित हुए बिना अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करने का मार्ग दिखाया है।

उन्होंने कहा कि “व्यास पीठ केवल कथा कहने का स्थान नहीं, बल्कि ज्ञान, गुरु-परम्परा और भारतीय सनातन संस्कृति की जीवंत परम्परा का प्रतीक है।” महर्षि वेदव्यास की ज्ञान-परम्परा से जुड़ी इस पवित्र पीठ से भगवान श्रीकृष्ण की कथा का श्रवण करना स्वयं में आध्यात्मिक अनुभूति है।

उन्होंने जन्माष्टमी के अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का केवल श्रवण और उत्सव न करें, बल्कि उनके प्रेम, करुणा, सत्य, धर्म और कर्मयोग के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करें।

इस अवसर पर उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रार्थना करते हुए कहा कि समाज में सद्भाव, परिवारों में प्रेम, युवाओं में संस्कार और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में धर्म एवं कर्तव्य की भावना का प्रकाश हो।

 

कार्यक्रम के प्रारम्भ में वरिष्ठ आचार्य प्रो रजनीश कुमार शुक्ल एवं प्रो शैलेश कुमार मिश्र के द्वारा विश्वकल्याण,संस्कृत व विश्वविद्यालय के अभ्युदय, और स्वस्थ समाज के सृजन के मनोकामना के साथ वैदिक विधि पूर्वक से भगवान श्री कृष्ण जी एवं माँ वाग्देवी जी की पूजा आराधना तथा आरती किया गया।

 

संगीत विभाग की डॉ श्रुति उपाध्याय एवं उनकी टीम के द्वारा सुन्दर भजन और गीत की प्रस्तुति सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणासी के माँ वाग्देवी मंदिर के सभागार में आज श्री कृष्ण जन्मअष्टमी महोत्सव में सँगीत विभाग के द्वारा श्री कृष्ण जी के वास्तविक दर्शन पर मधुर भजन से भाव विभोर कर दिया।

आलौकिक झांकी-माँ वाग्देवी के मंदिर के मंडप में अत्यन्त मनमोहक और अद्भुत झांकी को देखकर लोगों ने भगवान श्री कृष्ण के बाल लीला का दर्शन किये।अलौकिक दर्शन से नवीन पीढ़ी को अध्ययन करने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ।

संयोजक-उक्त महोत्सव मे वेद विभाग के अध्यक्ष प्रो. महेंद्र पान्डेय के संयोजकत्व में पूजन आदि डॉ. सच्चिदानंद और सन्तोष दुबे सह व्यवस्थापक के द्वारा कराया गया।

 

उक्त अवसर पर प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो शैलेश कुमार मिश्र, प्रो विजय कुमार पाण्डेय, डॉ रविशंकर पांडेय, डॉ श्रुति उपाध्याय, अजितेश द्विवेदी, डॉ सच्चिदानंद सहित विश्वविद्यालय परिवार उपस्थित थे।

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