शिक्षक ज्ञान, करुणा,मुल्यों, मानवीय संवेदनाओं से समाज का मार्ग दर्शन करते हैं: – मुख्य अतिथि

अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न 

 

वाराणसी।अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी में दो दिवसीय “आचार्यत्व: प्रज्ञा में प्रतिष्ठित” विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ। समापन सत्र की शुरुआत डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई द्वारा मंगलाचरण से हुई। इसके उपरांत दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की गई।

 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. वांगचुक दोरजी नेगी, कुलपति, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हायर तिब्बतन स्टडीज़ सारनाथ, वाराणसी तथा विशिष्ट अतिथि प्रो. पृथ्वीश नाग, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी ने की।

 

प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान) आईयूसीटीई, वाराणसी ने स्वागत उद्बोधन किया। कुछ प्रतिभागियों ने भी अपने अनुभव को साझा किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया।

 

मुख्य अतिथि प्रो. वांगचुक दोरजी नेगी, कुलपति, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हायर तिब्बतन स्टडीज़ सारनाथ, वाराणसी ने कहा कि संवेदना ही सब कुछ है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति इस दुनिया में सुख और शांति की कामना करता है और इसे बनाए रखना तथा सुरक्षित रखना हम सभी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने आचार्य के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षकों को इसी कारण समाज में देवतुल्य स्थान प्रदान किया गया है, क्योंकि वे ज्ञान, करुणा, मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन करते हैं। विशिष्ट अतिथि प्रो. पृथ्वीश नाग, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी ने कहा कि डिजिटल शिक्षा के बदलते दौर में शिक्षक की भूमिका में हो रहे परिवर्तन को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और डिजिटल माध्यमों को अपनाते हुए भी भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों एवं जीवन-दृष्टि को बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की अंतर्निहित शिक्षण-दृष्टि के साथ डिजिटल शिक्षा के समन्वय पर विशेष बल दिया।

 

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई ने सभी प्रतिभागियों को उनके भावी प्रयासों के लिए शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि संगोष्ठी के दौरान प्रतिभागियों ने जो कुछ सीखा है, उसे वे अपनी शिक्षण एवं अधिगम प्रक्रिया में प्रभावी रूप से प्रयोग करेंगे। उन्होंने संगोष्ठी से प्राप्त ज्ञान एवं अनुभवों को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

 

प्रथम सत्र में प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान), आईयूसीटीई ने विशिष्ट व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने “इंटीग्रेटिंग द आचार्याज़ विज़न: अलाइनिंग टीचर एजुकेशन विद द गोल्स ऑफ एनईपी 2020” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए आचार्य की दृष्टि को समकालीन शिक्षक शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने एनईपी-2020 के लक्ष्यों के अनुरूप शिक्षक शिक्षा को अधिक प्रभावी, मूल्यपरक एवं उद्देश्यपूर्ण बनाने पर विशेष बल दिया। इसके पश्चात शोध-पत्र प्रस्तुतिकरण सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने ‘आचार्यत्व’ से संबंधित विभिन्न विषयों पर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए तथा विषय के विविध अकादमिक आयामों पर विचारों का आदान-प्रदान किया।

 

इस संगोष्ठी में 10 राज्यों से 50 से अधिक प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम की रिपोर्ट डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह ने प्रस्तुत की तथा कार्यक्रम का संयोजन डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई एवं डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई ने किया।

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