शिक्षक केवल ज्ञान के प्रदाता नहीं, संस्कार, विवेक और चरित्र के निर्माता हैं :- कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा

 

 

वाराणसी। शिक्षक दिवस के अवसर पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने समस्त शिक्षक समुदाय को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारतीय परम्परा में शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के जीवन को दिशा देने वाला आचार्य, संस्कारों का संवाहक और राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है। भारत में 05 सितम्बर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के चित्र पर माल्यार्पण करते हुए कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि आधुनिक शिक्षक को तकनीक और नवीन ज्ञान का दक्ष उपयोग करने के साथ भारतीय ज्ञान-परम्परा, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना से भी जुड़ा होना चाहिए। आज शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना, परीक्षा और रोजगार तक सीमित नहीं रह सकता; शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थी में विवेक, विनम्रता, अनुशासन, संवेदना, कर्तव्यबोध और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का निर्माण करे।

उन्होंने भारतीय शास्त्रीय दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि “सा विद्या या विमुक्तये”-जो विद्या मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और संकीर्णता से मुक्त कर सत्य, विवेक और श्रेष्ठ आचरण की ओर ले जाए, वही वास्तविक विद्या है। इसी प्रकार उपनिषद् का “आचार्यदेवो भव” भारतीय गुरु-परम्परा में शिक्षक के गौरवपूर्ण स्थान को रेखांकित करता है। गुरु का दायित्व केवल विषय-वस्तु समझाना नहीं, बल्कि विद्यार्थी के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उन्हें श्रेष्ठ दिशा प्रदान करना है।

कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और तीव्र गति से बदलते ज्ञान-विज्ञान ने शिक्षक की भूमिका को समाप्त नहीं किया है, बल्कि उसे और अधिक महत्वपूर्ण एवं उत्तरदायी बनाया है। तकनीक जानकारी दे सकती है, परंतु जीवन-मूल्य, मानवीय संवेदना, विवेक और चरित्र का निर्माण शिक्षक ही कर सकता है। इसलिए आधुनिक शिक्षक को तकनीकी रूप से सक्षम होने के साथ-साथ मानवीय और आध्यात्मिक दृष्टि से भी समृद्ध होना आवश्यक है।

 

उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा-दर्शन में गुरु और शिष्य का संबंध केवल कक्षा तक सीमित नहीं था। गुरु अपने आचरण से शिक्षा देता था और शिष्य अपने जीवन से उस शिक्षा को सार्थक करता था। आज आवश्यकता है कि आधुनिक शिक्षा में उसी गुरु-शिष्य परम्परा की आत्मा को नवीन शैक्षिक पद्धतियों के साथ समन्वित किया जाए। इससे ज्ञान के साथ संस्कार और कौशल के साथ चरित्र का निर्माण संभव होगा।

 

कुलपति ने शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहा कि शिक्षक स्वयं निरंतर सीखने वाला व्यक्तित्व बने, क्योंकि जो शिक्षक समय के साथ स्वयं को अद्यतन करता है, वही अपने विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार कर सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का प्रत्येक शब्द, व्यवहार और आचरण विद्यार्थी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है। अतः शिक्षक का जीवन स्वयं एक जीवंत पाठशाला होना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि विकसित भारत की संकल्पना केवल आर्थिक और तकनीकी प्रगति से पूर्ण नहीं होगी; इसके लिए ज्ञानवान, संस्कारित, चरित्रवान और संवेदनशील नागरिकों का निर्माण आवश्यक है। इस महान दायित्व के केंद्र में शिक्षक है। शिक्षक जितना सशक्त, सजग और मूल्यनिष्ठ होगा, राष्ट्र का भविष्य उतना ही उज्ज्वल होगा।

 

कुलपति प्रो. शर्मा ने शिक्षक दिवस पर सभी गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि “गुरु वह दीप है, जो स्वयं प्रकाशमान रहकर असंख्य जीवनों में ज्ञान, संस्कार और संभावनाओं का प्रकाश फैलाता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की आध्यात्मिक चेतना और आधुनिक विज्ञान-तकनीक का समन्वय भारत की शिक्षा को विश्व के लिए एक नई दिशा प्रदान करेगा।

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”

शिक्षक दिवस पर उनका यह संदेश स्पष्ट करता है कि आधुनिक भारत के शिक्षक को ज्ञान का स्रोत ही नहीं, बल्कि विवेक का मार्गदर्शक, संस्कार का संरक्षक और राष्ट्र-निर्माण का सशक्त आधार बनना होगा।

शिक्षक दिवस के अवसर पर वेद वेदांग संकाय के अंतर्गत भी शिक्षक दिवस आचार्यों के सम्मान के साथ मनाया गया।

उक्त अवसर पर प्रो जितेन्द्र कुमार, प्रो महेन्द्र पाण्डेय, प्रो दिनेश कुमार गर्ग,प्रो अमित कुमार शुक्ल एवं डॉ मधुसूदन मिश्र सहित अन्य लोग उपस्थित थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *