
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘दुर्गा का मंदिर’ पर हुआ मंथन।
वाराणसी। पराया धन या बेईमानी से मिला धन कभी सुख नहीं देता, वह केवल आंतरिक अशांति और पतन का कारण बनता है। सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि नीति और धर्म के पालन से मिलने वाली आत्मिक शांति में निहित है।” यह विचार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह ने व्यक्त किए। वे वाराणसी में प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र द्वारा आयोजित ‘सुनो मैं प्रेमचंद’ कार्यक्रम के 2077वें दिवस पर मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘दुर्गा का मंदिर’ की समीक्षा कर रहे थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ। कवयित्री झरना मुखर्जी और विदूषी सहाना ने कहानी का सस्वर पाठ किया। प्रो. श्रद्धानंद ने कहा कि यह रचना भूल स्वीकार कर प्रायश्चित करने का संदेश देती है।
कार्यक्रम का संचालन आयुषी दूबे और स्वागत राहुल यादव ने किया। इस अवसर पर प्रो. श्रद्धानंद, डॉ. राम सुधार सिंह, राजीव गोंड, प्रकाश चन्द्र श्रीवास्तव, जयप्रकाश धानापुरी, विनोद वर्मा, प्रमोद कुमार, प्रतीक श्रीवास्तव, तेजस कुमार सिंह, कुमार महेंद्र, नमन श्रीवास्तव, राजेश श्रीवास्तव, रामजतन पाल, रोहित गुप्ता, समीक्षा त्रिपाठी, विवेक त्रिपाठी, विवेक विश्वकर्मा और आनंद थे।

Leave a Reply