
वाराणसी। केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ के अतिश सभागार में “भारतीय ज्ञान परम्परा में चित्त की अवधारणा” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता प्रो. सामदोंग रिनपोछे ने कहा कि दार्शनिक परंपराओं में चित्त का अत्यधिक महत्व है, लेकिन ज्ञान और आध्यात्मिक विद्या के बिना इसके गूढ़ स्वरूप को जानना सरल नहीं है।
उन्होंने प्राचीन ज्ञान सागर को पुनर्जीवित करने पर जोर देते हुए कहा कि अविद्या ही समस्त दुखों का मूल है। मनुष्य सुख और दुख बाहरी जगत में ढूंढता है, जबकि सारी समस्याओं का समाधान चित्त के शुद्धिकरण में निहित है। बौद्ध धर्म में धम्मपद की पहली गाथा का हवाला देते हुए बताया गया कि मन ही सभी मानसिक अवस्थाओं का प्रधान है। लोभ, द्वेष और मोह से युक्त चित्त दुख पैदा करता है, जबकि शुद्ध चित्त कल्याणकारी कर्मों का मार्ग प्रशस्त करता है।
स्वागत भाषण में कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने कहा कि आधुनिक भूमंडलीकरण में अति-उपयोगितावादी सोच और काम-अर्थ के पीछे दौड़ना ही सभी समस्याओं की जड़ है। हमारा व्यक्तित्व केवल भौतिक नहीं, बल्कि चेतना पर आधारित है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. महेश शर्मा और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुनीता चंद्रा ने किया। इस दौरान कई शिक्षाविद् उपस्थित रहे।

Leave a Reply