गुरु-परंपरा और गुरु-सेवा से ही प्राप्त होती है वास्तविक विद्या – श्रीकांत मिश्र गुरुजी

वाराणसी। काशी में आयोजित श्री शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा कण्ठस्थ दण्डक्रम पारायण में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्र गुरुजी ने गुरु-शिष्य परंपरा एवं गुरु-सेवा के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।

 

उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। गुरु की सेवा, श्रद्धा एवं समर्पण से ही शिष्य वास्तविक विद्या और ज्ञान प्राप्त कर सकता है। गुरु के सान्निध्य एवं आशीर्वाद से ही जीवन में ज्ञान की वास्तविक समृद्धि प्राप्त होती है। उन्होंने वैदिक परंपरा के संरक्षण में गुरु-शिष्य संबंध की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।

 

यह वैदिक आयोजन कांची कामकोटि पीठ के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्री शंकर विजयेंद्र सरस्वती जी महाराज एवं पूज्य गोविंद देवगिरि जी महाराज के आशीर्वाद एवं संरक्षण में तथा महर्षि वेदव्यास प्रतिष्ठान एवं समर्थाद्वैत पाठशाला के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हो रहा है।

 

इस अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्र गुरुजी, शुक्ल यजुर्वेद काण्व शाखा के विद्वान श्री निवास पुराणिक गुरुजी, बिंदु माधव मंदिर के न्यासी अध्यक्ष एवं अर्चक श्री पटवर्धन जी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से श्री नारायण प्रसाद भट्टराई जी तथा श्री अमित अगस्ती गुरुजी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

 

पारायण के अंतर्गत वेदाध्यायी बटुक समर्थ शैलेंद्र काकड़े एवं अद्वैत शैलेंद्र काकड़े की परीक्षा संपन्न हुई। परीक्षा के परीक्षक के रूप में वेदभास्कर श्री प्रशांत जोशी गुरुजी एवं श्री किरण भाटक गुरुजी उपस्थित रहे। उन्होंने बटुकों के वैदिक मंत्रोच्चार, स्मरण शक्ति एवं दण्डक्रम पारायण का परीक्षण कर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।

 

इस आयोजन की संयोजन मंडली में श्री बी.एस. सुब्रमण्यम जी, श्री व्यंकटरमण घनपाठी जी, श्री शैलेंद्र काकड़े गुरुजी एवं श्री गजानन ज्योतकर गुरुजी का महत्वपूर्ण योगदान है।

 

काशी की पावन धरती पर आयोजित यह दण्डक्रम पारायण भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक मौखिक संरक्षण पद्धति एवं गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

 

आयोजन समिति की ओर से सभी आगंतुक विद्वानों, धर्माचार्यों एवं अतिथियों का सादर अभिनंदन एवं आभार व्यक्त किया गया।

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