
वाराणसी । कहानी बुढ़ी काकी आज के समय में भी प्रासंगिक है इस कहनी में मुंशी प्रेमचन्द ने एक ऐसे सामाजिक वातावरण का दृश्य खड़ा किया है, जो एक अकेली बूढ़ी काकी के जीवन में ही नहीं, कितने ही वृद्धों के जीवन में ऐसा हो रहा है। भले ही वह पण्डित बुद्धिराम और रूपा द्वारा उसे अपमानित और प्रताड़ित करने का हो, सगाई-तिलक समारोह का हो, जूठी पत्तल चाटने का हो या रात्रि के समय में कहानी का वातावरण प्रभावोत्पादक रहा है। जैसे ही रूपा स्वादिष्ट पकवानों से भरा हुआ थाल लेकर बूढ़ी काकी के सामने आती है, उस वातावरण का चित्रण तो मन को रोमांचित कर देता है। और वह पछतावा करती है। मुंशी प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र ट्रस्ट, लमही द्वारा आयोजित दैनिक कार्यक्रम सुनों मैं प्रेमचंद के 1069 दिन पूरे होने पर संस्था के निदेशक राजीव गोंड ने कहा। प्रेमचंद की कहानी बूढ़ी काकी का पाठन रंगकर्मी साक्षी यादव ने किया। कमल किशोर ने कहा कि मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखित कहानी ‘बूढ़ी काकी’ का कथानक सामाजिक समस्या पर केन्द्रित होते हुए भी रोचक, जिज्ञासापूर्ण, उत्सुकता भरा, करूणामय तथा प्रभावोत्मकता से परिपूर्ण है। इसमें प्रेमचंद जी ने बूढ़ी काकी के माध्यम से कथानक का सृजन करते हुए मानव की स्वार्थी और कृतध्नतापूर्ण मानसिकता का चित्रण किया है। इस अवसर पर अजय यादव, राहुल यादव, रोहित पाल, आनंद कुमार, देव बाबू, सुरेश चंद्र दूबे, राजेश श्रीवास्तव, मनोज विश्वकर्मा आदि थे।
