
एम्पावरिंग एजुकेटरी इन ग्लोबल साउथ विषयक कार्यशाला, पांचवां दिन

वाराणसी।‘एम्पावरिंग एजुकेटर्स इन द ग्लोबल साउथ’ विषय पर आठ दिवसीय कार्यक्रम अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी परिसर में आयोजित हो रहा है, जिसका आज पाँचवा दिन है। यह कार्यक्रम यूनेस्को एमजीआईईपी, नई दिल्ली और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग कार्यक्रम, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। आज कुल चार सत्र चले।
पहले सत्र में प्रारंभिक बाल्यावस्था का परिचय दिया गया, जिसमें प्रमुख शब्दों को परिभाषित किया गया और प्रतिभागियों को विषय की गहरी समझ प्रदान करने के लिए विभिन्न गतिविधियाँ संचालित की गई ।

इस सत्र ने बाल्यावस्था विकास के महत्व को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हुए अगले विचार-विमर्श की नींव रखी।
दूसरे सत्र का शीर्षक ‘प्रारंभिक बाल्यकाल देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) में सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण (SEL): बुनियादी कौशल’ था। यह सत्र उत्साहजनक ताली और ध्वनि गतिविधि से शुरू हुआ। चर्चा का मुख्य विषय था, ‘ECCE के संदर्भ में मुख्य संकेतक क्या है?’ प्रतिभागियों ने सीखा कि मुख्य संकेतक बच्चों के संज्ञानात्मक और शारीरिक विकास के संकेतक होते हैं। इस सत्र में तीन प्रमुख विकास क्षेत्रों – सामाजिक-भावनात्मक, शारीरिक और भाषा – पर चर्चा की गई। सामाजिक-भावनात्मक संकेतक बताते है कि बच्चे ‘मेरा’ और ‘उसका/उसकी’ जैसे अवधारणाओं को समझते हैं और खुशी, दुख, गुस्सा और ऊबन जैसे व्यापक भावों को व्यक्त करते हैं। शारीरिक संकेतक में सीढ़ियों पर एक-एक कर कदम रखते हुए चढ़ना-उतरना, जार के ढक्कन को खोलना और बंद करना, और सूक्ष्म मोटर कौशल विकसित करना शामिल हैं। भाषा संकेतक में बच्चे अपना नाम और उम्र बताना, 5-6 शब्दों के वाक्य बोलना और 4 साल की उम्र तक पूर्ण वाक्य बनाना शामिल है।
तीसरे सत्र ने सक्रिय शिक्षण को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें बच्चों को सार्थक और सहभागी शैक्षिक अनुभवों में संलग्न करने की रणनीतियों पर जोर दिया गया। इस सत्र में बच्चों में जिज्ञासा और सीखने को बढ़ावा देने के लिए एक इंटरैक्टिव और प्रेरणादायक माहौल बनाने के महत्व की चर्चा की गई।
चौथे सत्र में आत्म-नियमन और भावनात्मक नियमन पर चर्चा की गई, जिसमें प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास में उनके महत्व को रेखांकित किया गया। इंटरएक्टिव गतिविधियों के माध्यम से, प्रतिभागियों को SEL, न्यूरोप्लास्टिसिटी, और अनुकूल सीखने के माहौल के निर्माण की गहरी समझ प्राप्त हुई। यह भी जोर दिया गया कि SEL केवल एक विषय नहीं है, बल्कि यह एक संस्कृति है, जिसके मुख्य कौशल में भावनात्मक जागरूकता, आत्म-नियमन, सहानुभूति, सक्रिय सुनना आदि शामिल हैं।
इस कार्यक्रम में 19 देशो के 60 शिक्षक भाग ले रहे है। सत्र के वक्ताओं अन्या चक्रवर्ती, भाव्या, श्रेया तिवारी, और रेणुका रौतेला ने प्रतिभागियों के साथ अपनी विशेषज्ञता साझा की।
इस कार्यक्रम का समन्वय आईयूसीटीई के कार्यक्रम निदेशक प्रो. आशीष श्रीवास्तव और यूनेस्को एमजीआईईपी, नई दिल्ली की राष्ट्रीय परियोजना अधिकारी श्रीमती अर्चना चौधरी द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के कोर्स समन्वयक डॉ. कुशाग्रि सिंह और डॉ. राजा पाठक है।
