राजर्षि का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य सत्य के लिए सत्य का आराधना था:-डा.रामसुधार सिंह 

 

वाराणसी। फरवरी 1902 को भिनगा के राजा राजर्षि उदय प्रताप सिंह से काशी में विवेकानंद की मुलाकात हुई थी। तब राजर्षि ने कहा था स्वामी जी मेरे विनम्र अनुमान में आप महात्मा बुद्ध और आचार्य शंकर की भांति दिव्य आत्मा है। मुझे आशीर्वाद दीजिए। साथ ही राजर्षि ने स्वामी जी से काशी में संन्याश्रम स्थापित करने के लिए निवेदन किया। अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए, उनके पास 500 का चेक भी भेजा। बाद में स्वामी जी ने वह पैसा स्वामी शिवानंद को दिया, जिन्होंने 4 जुलाई 1902 को श्री रामकृष्ण अद्वैत आश्रम की स्थापना की। यह बातें प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. हरिकेश सिंह ने यूपी कालेज और अन्तर्विश्वविद्यालय अध्यायक शिक्षा केन्द्र बीएचयू के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी राजर्षि उदय प्रताय सिंह जू देवः शिक्षा, लोकोपकार एवं राष्ट्र निर्माण की एक विरासत में मुख्य वक्ता के रूप में कही। विशिष्ट वक्ता माँ विन्ध्य वासिनी विश्वविद्यालय की कुलपति कुर प्रो शोभा गौड़ ने कहा कि राजर्षि का जीवन शिक्षा, साहित्य एवं आध्यात्म का समन्वय है। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. सीमा सिंह ने कहा कि राजर्षि पर साहित्य का सृजन एवं उसका प्रकाशन ही राजर्षि को सच्ची श्रद्धान्जलि होगी। दिल्ली विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो रजनी रंजन सिंह ने कहा कि राजर्षि का दर्शन कर्तव्य आधारित है न कि अधिकार आधारित। साहित्यकार डा. राम सुधार सिंह ने कहा कि राजर्षि का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य सत्य के लिए सत्य का आराधना था। उन्होंने कहा है कि शिक्षा वहीं क्षेष्ठ है जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके। वो चाहते थे कि विद्यार्थी का शरीर स्वस्थ, मस्तिष्क ऊर्जावान और हदय में सौंदर्य की अनुभूति हो।

प्राचार्य प्रो. धर्मेन्द्र कुमार सिंह ने स्वागत भाषण देते हुए राजर्षि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कुछ अनछुए पहलुओं से सभी को अवगत कराया। धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव प्रो रमेश धर दिवेदी,संचालन प्रो रेनू सिंह ने किया। संगोष्ठी में डा.अशोक कुमार सिंह, डा. उदय प्रताप सिंह डा मेजर अरविन्द कुमार सिंह एवं प्रो. प्रदीप सिंह, प्रो प्रदीप सिंह,प्रो एनपी सिंह, प्रो गरिमा सिंह, प्रो शशिकान्त द्विवेदी, प्रो मनोज प्रकाश त्रिपाठी, प्रो सुधीर राय, प्रो सुधीर शाही, प्रो० प्रज्ञा पारमिता, प्रो नीलिमा सिंह, प्रो० अलका रानी गुप्ता, प्रो० गोरखनाथ पाण्डेय आदि थे।

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