वाराणसी।डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर, उनके जीवन और योगदान को याद करना महत्वपूर्ण है। वह एक महान नेता थे जिन्होंने सामाजिक अन्याय और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष किया और भारत के संविधान का निर्माण किया।उनके तीन मूलमंत्र – “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” – आज भी हमें प्रेरित करते हैं। आइए हम उनके आदर्शों और मूल्यों को अपनाकर एक समावेशी और समानता पर आधारित समाज की दिशा में काम करें।

उक्त विचार संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी के”जन्म दिवस की पूर्व संध्या पर योगसाधना केन्द्र में श्रमण विद्या संकाय में “डॉ.भीमराव की उपादेयता” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि केन्द्रीय बौद्ध विद्या संस्थान, चोगलमसर लेह लद्दाख के कुलपति प्रो राजेश रंजन ने व्यक्त किया।

कुलपति प्रो रंजन ने कहा कि

पालि ग्रंथों में निर्वाण की अवधारणा एक समतामूलक समाज की दृष्टि को बढ़ावा देती है, जहां सभी व्यक्तियों को समान रूप से देखा जाता है और कोई भी व्यक्ति अपने जन्म, जाति या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का सामना नहीं करता है। यह अवधारणा सामाजिक समानता को बढ़ावा देती है और सभी व्यक्तियों को अपने आप को विकसित करने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के समान अवसर प्रदान करती है।

मुख्य वक्ता पूर्व कुलपति नव नालंदा महाविहार के प्रोफेसर राम नक्षत्र प्रसाद ने बाबा भीमराव के विविध आयामों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बाबा साहब ने एक नवीन अध्याय का सृजन किया। जनसेवा सामाजिक न्याय एवं संघर्ष के स्पष्ट प्रतिमूर्ति बाबा भीमराव अंबेडकर थे। बाबा साहब के शैक्षिक जीवन में समाज के अभिजात्य वर्ग का भी महान योगदान रहा है। राजनेता के साथ-साथ एक महान बौद्ध संत थे जिन्होंने शिक्षा, सभ्यता,संघर्ष तीनों को जीवन का मुख्य अंग बनाने के लिए समाज को अभिप्रेरित किया। पूना पैक्ट की चर्चा करते हुए प्रोफेसर राम नक्षत्र प्रसाद ने बताया कि संविधान शिल्पी अंबेडकर ने आरक्षण वंचितों एवं गरीबों के उत्थान के लिए आवश्यक बताया।

पूर्व संकाय प्रमुख प्रो. हर प्रसाद दीक्षित ने बतौर विशिष्ट अतिथि बाबा साहब को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए अपने उद्बोधन के माध्यम से बताया कि बाबा साहब का व्यक्तित्व एवं कृतित्व हम सभी के लिए अनुकरणीय। बौद्ध धर्म में निहित सर्व समावेशी एवं सामाजिक न्याय से प्रभावित होकर बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को अपनाया एवं भगवान बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए सभी को प्रेरित किया। भारत देश के प्रति बाबा साहब का योगदान अविस्मरणीय है।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि डॉ भीमराव अंबेडकर जी का जीवन दर्शन उनके सामाजिक समरसता का आदर्श दर्शन है, वे स्वंय एक विचार हैं।डॉ. अंबेडकर का जन्म: 14 अप्रैल 1891, मध्य प्रदेश के महू ,शिक्षा: मुंबई विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क), ग्रेज़ इन (लंदन), लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स, सामाजिक न्याय के लिए एक मुख्य नेतृत्वकर्त्ता एवं भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार थे।वे सामाजिक समरसता एवं सामाजिक उत्थान के सूत्रधार हैं।मानव गरिमा के पक्षकार, समाज को समरसता की तरफ ले जाने वाले डॉ अंबेडकर जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।शिक्षा के माध्यम से सामाजिक समरसता की उत्पत्ति किया जा सकता है।

कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि आज हनुमानजी की जयंती भी है, जिन्होंने त्रेतायुग में प्रकृति और मानवता की रक्षा के लिए कार्य किया जो कि स्वंय जंगलों, पर्वतों पर रहते हुए राजा और वन्य जीवों को जोड़ने का सामंजस्यपूर्ण कार्य किया।ऐसे में डॉ अंबेडकर जी के प्रति समर्पित विचार सभी आत्मसात करें।

छात्र कल्याण संकाय प्रमुख प्रो हरिशंकर पाण्डेय ने विषय को विस्तारित कर प्रकाश डाला।

सभा का स्वागत भाषण संकाय प्रमुख प्रो रमेश प्रसाद एवं संचालन डॉक्टर रविशंकर पांडेय किया।डॉ मधुसूदन मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

मंच पर आसीन अतिथियों का माल्यार्पण एवं अंग वस्त्र ओढ़ाकर स्वागत और अभिनंदन किया।

अम्बेडकर जयंती समारोह के प्रारम्भ में डॉ. लेख मणि ने वैदिक मंगलाचरण,पौराणिक मंगलाचरण स्वामी रामचंद्र तथा बौद्ध भिक्षुओं ने पालि मंगलाचरण किया।

मंच पर आसीन अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्वलन तथा माँ सरस्वती जी एवं डॉ. अंबेडकर जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।

इस पावन अवसर पर प्रोफेसर हरिशंकर पाण्डेय,प्रो दिनेश कुमार गर्ग,प्रो. विद्या कुमारी,डॉ. इन्द्र भूषण झां, मधुसूदन मिश्र ,डॉ विजेंद्र कुमार आर्य, बौद्ध भिक्षुओं के साथ विश्वविद्यालय परिवार आदि उपस्थित रहे।

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