
वाराणसी।भगवान परशुराम जयंती पर्व के अवसर पर, हम उनके जीवन परिचय और मूल्यों को जानने का अवसर प्राप्त करते हैं। भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं और उनका जीवन एक अद्वितीय उदाहरण है जो हमें सादगी, त्याग, और सेवा के मूल्यों को सिखाता है। यह जयंती अक्षय तृतीया पर्व के रूप में भी मनाया जाता।उक्त विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने परशुराम जयंती एवं अक्षय तृतीया के पूर्व संध्या पर व्यक्त किया।
भगवान परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। उनका नाम “परशुराम” इसलिए रखा गया क्योंकि उन्हें भगवान शिव से एक परशु (फरसा) मिला था। भगवान परशुराम ने अपने जीवन में कई अद्वितीय कार्य किए, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
भगवान परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन का वध किया, जो एक शक्तिशाली राजा था लेकिन उसने ऋषियों और निरीह लोगों पर अत्याचार किया था।
भगवान परशुराम के जीवन से हमें कई महत्वपूर्ण मूल्य सीखने को मिलते हैं। भगवान परशुराम का जीवन सादगी और त्याग का प्रतीक है। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी ऐश्वर्य और भोग की कामना नहीं की। भगवान परशुराम ने हमेशा जरूरतमंद लोगों की सेवा की और उनकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहे। भगवान परशुराम ने अपने जीवन में धर्म और न्याय की स्थापना के लिए काम किया और अधर्मियों का नाश किया।भगवान परशुराम ने अपने जीवन में धर्म और न्याय की स्थापना के लिए काम किया और अधर्मियों का नाश किया।
*अक्षय तृतीया:*
अक्षय तृतीया के दिन किए गए पुण्य कार्य अक्षय रहते हैं और कभी नष्ट नहीं होते हैं।
अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु और परशुराम की पूजा- अर्चना करने से सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
भगवान परशुराम जयंती सनातन धर्म संस्कृति, सामाजिक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस पर्व का महत्व निम्नलिखित है।
भगवान परशुराम जयंती धर्म और न्याय के महत्व को याद दिलाती है। यह पर्व सामाजिक समरसता और एकता को बढ़ावा देता है।भगवान परशुराम जयंती राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति को मजबूत बनाती है।
