
सावन और भादो का महीना भारतीय संस्कृति में केवल ऋतु-परिवर्तन का नहीं, बल्कि स्त्रियों की आस्था, श्रृंगार और समर्पण के पर्वों का समय होता है। इन्हीं में प्रमुख है हरतालिका तीज—एक ऐसा पर्व, जो निर्जल व्रत की कठोरता से आगे बढ़कर प्रेम, विश्वास और अटूट समर्पण का उत्सव है।
पौराणिक कथा की झलक
मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। वन में निर्जल रहकर उन्होंने तप किया और उनकी इस अटूट निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार किया। तभी से यह परंपरा चल पड़ी कि स्त्रियाँ हरतालिका तीज का व्रत कर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं और अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
श्रृंगार और तीज की छटा
हरतालिका तीज का सबसे आकर्षक पक्ष है सोलह श्रृंगार। महिलाएँ प्रातः स्नान-ध्यान कर नए वस्त्र धारण करती हैं। हाथों में मेहंदी, पैरों में महावर, माथे पर सिंदूर और बिंदी, चूड़ियों और पायल की खनक—सब मिलकर वातावरण को उत्सवी बना देते हैं। लोकगीतों की गूंज, जैसे—
“तीज मना दे हो सखियन, पिया आयिहें संझवारे…”
न केवल इस पर्व की रौनक हैं बल्कि स्त्रियों की भावनाओं का जीवंत प्रतीक भी हैं।
काशी में तीज का उत्सव
वाराणसी की गलियाँ और घाट इस दिन एक विशेष आभा से भर उठते हैं। गंगा तट पर महिलाएँ स्नान कर शिव-पार्वती का पूजन करती हैं। सायं होते ही दीपों की झिलमिलाहट और मंगलगान की स्वर-लहरियाँ वातावरण को भक्ति से सराबोर कर देती हैं। काशी विश्वनाथ, अन्नपूर्णा और मुक्ता भवन जैसे मंदिरों में विशेष सजावट और पूजन-अर्चना होती है।
व्रत, कथा और जागरण
यह पर्व केवल उपवास तक सीमित नहीं है। रात्रि भर तीज की कथा, भजन-कीर्तन और जागरण का आयोजन होता है। कथा में माता पार्वती की तपस्या और शिव से उनका मिलन वर्णित है, जो स्त्रियों को धैर्य, संयम और समर्पण का संदेश देता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ
हरतालिका तीज धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ सांस्कृतिक उत्सव भी है। यह महिलाओं के आपसी मेल-जोल और पारिवारिक बंधन को गहरा करता है। लोकगीत, नृत्य, श्रृंगार और पूजा-अर्चना मिलकर इसे परंपरा और आधुनिकता का सेतु बनाते हैं।
