पं. कमलापति त्रिपाठी काशी के नहीं देश के भी गौरव थे- कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा 

वाराणसी।पंडित कमलापति त्रिपाठी जी का राजनीति उनके जीवन का सम्पूर्ण व्यक्तित्व का परिचय नहीं हो सकता। राजनीति प्रासंगिक हैं यदि वे राजनेता के साथ कुशल पत्रकार थे। उनका जीवन दर्शन भारतीय संस्कृति एवं संस्कार को परिभाषित करता है, वे इस संस्था के संस्थापकों में से एक थे यहां की संस्कृति एवं संस्कार से हम वैश्विक पटल पर स्थापित हैं,ऐसे में इस संस्था का कार्य और महत्वपूर्ण हो जाता है. उक्त विचार संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं संस्था के संस्थापक पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के 120 वीं जयंती महोत्सव का कार्यक्रम योग साधना केंद्र में आहूत की गयी।

जयंती समारोह में श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो.मुरली मनोहर पाठक बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किया।

कुलपति प्रो पाठक ने कहा कि यह विश्वविद्यालय अत्यंत प्राचीन है काशी की संस्कृति और संस्कृत को संपूर्ण राष्ट्र के साथ वैश्विक स्तर पर ले जाने का कार्य यह संस्था आज तक कर रहा है. आज यह संस्था अपने संस्थापक का जयंती मनाकर अपने संस्कार की तरफ इंगित करते हुए हम सभी के लिए यह विशिष्ट संदेश देता है।

कुलपति प्रो. मुरली मनोहर ने कहा कि इस परिसर में आने पर स्वंय ऊर्जा और गौरव की अनुभूति करते हैं।यहां की भूमि में ऋषि तुल्य आचार्यों के तप और ज्ञान की सुगंध से एक देव स्थल सा अनुभव होता है। संस्कृत भाषा वैज्ञानिक भाषा है दुनिया में प्राचीनतम ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। संस्कृत भाषा चिकित्सा और स्वास्थ की भाषा है इसके श्रवण मात्र से ही अवसाद मुक्त और संस्कारों से परिष्कृत हो जाते हैं. इस परिसर से ही देश को दिशा प्राप्त होगी.

अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व के धनी पं.कमलापति त्रिपाठी से जुड़ी स्मृतियों का सिलसिला अनन्त है। सन् 1905 में इसी बनारस की पवित्र धरती पर ऋषी पंचमी के दिन जन्मे पंडित जी की जयन्ती संवत और ईस्वी सन् दोनों की तिथियों पर मनाने की प्रशस्त परम्परा रही है। जो व्यक्ति ऋषि पंचमी के दिन पैदा होता है वह ऋषि ही होता है। उनकी 120 वीं जयन्ती पर उनकी सतत प्रेरक स्मृतियों को मैं प्रणाम करता हूं। पं. कमलापति त्रिपाठी काशी के नहीं देश के भी गौरव थे।

हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्थापित- संविधान सभा में उन्होंने अपनी सक्रिय भूमिका निभाते हुए अपनी मां यानी हिंदी का साथ दिया। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित कराने के साथ ही उन्होंने भारतीय गणतंत्र के नामकरण जैसे मामलों में उल्लेखनीय संसदीय भूमिका निभाई थी।

कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि उनके योगदान सदैव उनके संस्कृत शास्त्रों के ज्ञान पक्ष को ही दर्शाता है सच कहने का साहस केवल पंडित जी मे था जिसके बल पर उन्होंने अनेकों सामाजिक विकास के कार्य किए जिसको लोग विभिन्न संस्मरणों के माध्यम से याद करते हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण संस्कृत और संस्कृत विश्वविद्यालय ही।कर सकते हैं।आज देश के 18 संस्कृत विश्वविद्यालय मिलकर संस्कृत और संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं।

उस दौरान पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के जीवन दर्शन पर प्रो सतीश कुमार राय ने कहा कि कमलापति जी सनातनी व्यक्तित्व थे।डॉ विजय शंकर पांडेय आदि ने अपने विचार व्यक्त किया।

अतिथियों के द्वारा पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के जन्म जयन्ती समारोह के उपलक्ष्य में कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के द्वारा वृक्षारोपण व पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के प्रतिमा पर चंदन का टीका कर माल्यार्पण भी किया गया।

अन्य वक्ता गण-डॉ. विजय शंकर पाण्डेय ने कहा कि पंडित जी काशी के ब्रांड एंबेसडर और इस संस्था के संस्थापकों में से थे ।

मंचस्थ अतिथियों के द्वारा प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित

श्री तंत्रालोक: षष्ठो भागः – षष्ठ भाग में सोलहवें आह्निक से सत्ताइसवें आह्निक तक समाविष्ट किया गया है।सप्तमो भागः- इस ग्रन्थ के सप्तम भाग में अट्ठाइसवें आह्निक से उनतीसवें आह्निक तक सामविष्ट किया गया अष्टमो भागः- इस ग्रन्थ के अष्टम भाग में तीसवें आह्निक से सैतीसवें आह्निक तक समाविष्ट किया गया है।

जिसका लोकार्पण किया गया।

मंगलाचरण-वैदिक, पौराणिक मंगलाचरण किया गया।

जयंती महोत्सव के प्रारम्भ मंचस्थ अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्वलन एवं पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के प्रतिमा/मूर्ति पर माल्यार्पण किया।

अतिथियों का स्वागत और अभिनंदन- आयोजक द्वारा मंचस्थ अतिथियों का चन्दन, माला,अंग वस्त्रम एवं नारिकेल के साथ स्वागत और अभिनंदन किया गया।

इस जयंती समारोह में विश्वविद्यालय के चार आचार्यों का अभिनंदन-कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के द्वारा प्रो विधु द्विवेदी,प्रो. महेन्द्र पांडेय, डॉ रविशंकर पांडेय एवं डॉ कुंज बिहारी द्विवेदी तथा पूर्व नेता डॉ विजय शंकर पांडेय को माला एवं अंगवस्त्रम,नारिकेल से स्वागत और अभिनंदन किया।

प्रो. सुधाकर मिश्र ने वाचिक स्वागत भाषण करते हुए पंडित जी के जीवन वृतांत पर प्रकाश डाला। समारोह का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए प्रो.राघवेंद्र जी दुबे ने किया। निदेशक प्रकाशन संस्थान डॉ. पद्माकर मिश्र ने संचालन किया।

उक्त अवसर पर कुलसचिव राकेश कुमार, प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल,प्रो सतीश कुमार राय,प्रो विधु द्विवेदी, प्रो.शैलेष कुमार मिश्र, डॉ विजय शंकर पांडेय, प्रो. हीरककांति चक्रवर्ती,,प्रो राघवेन्द्र जी दुबे डॉ.रविशंकर पांडेय,प्रो. विजय कुमार पाण्डेय, प्रो.विद्या कुमारी चंद्रा, डॉ विशाखा शुक्ला,,डॉ. कुंजबिहारी शर्मा, डॉ उमापति उपाध्याय के साथ-साथ छात्र,अधिकारी कर्मचारी आदि उपस्थित थे।

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