
काशी की सृजन परंपरा विषयक व्याख्यान में साहित्यकारों ने रखे विचार

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय, एलटी कॉलेज (अर्दली बाजार) में रविवार को हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा विषयक व्याख्यान हिन्दी साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने किसान, स्त्री और दलित की आवाज़ को अपनी कहानियों में जगह दी। वे मानते थे कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से समाज नहीं बदल सकता। प्रो. बलराज पांडेय ने कहा कि गोदान और कफ़न जैसी रचनाओं से प्रेमचंद ने हिन्दी ही नहीं, भारतीय कथा साहित्य को नई ऊँचाई दी। उन्होंने सदियों से उपेक्षित लोगों को नायकत्व प्रदान किया और जाति-धर्म आधारित भेदभाव का विरोध किया।
डा. मुक्ता ने बंगमहिला (राजेन्द्र बाला घोष) के योगदान पर कहा कि जब स्त्रियों की स्थिति दयनीय थी, तब उन्होंने दुलाईवाली जैसी कहानियों से सामाजिक चेतना जगाई। वे स्त्री-पुरुष समानता की प्रबल पक्षधर थीं और लोकजागरण को अपनी लेखनी का ध्येय बनाया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अशोक कुमार सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने दिया। बड़ी संख्या में कवि, लेखक, छात्र-छात्राएँ और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
