अच्छे शिक्षक अच्छे विद्यार्थी तैयार करेंगे

 

शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर छः सेवा निवृत्त आचार्य हुए सम्मानित

अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र में शिक्षा दिवस समारोह सम्पन्न

 

वरिष्ठ संवाददाता, नज़र न्यूज नेटवर्क 

 

वाराणसी। गुरुवार को अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र, वाराणसी में शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर ‘शिक्षक दिवस एवं शिक्षक सम्मान समारोह’ का आयोजन सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण व मां सरस्वती, महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी तथा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की प्रतिमा पर पुष्पार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी तथा सारस्वत अतिथि व मुख्य वक्ता प्रो. बिहारी लाल शर्मा, कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय रहे। साथ ही, शिक्षक सम्मान समारोह में 6 सेवानिवृत्त आचार्यों को शिक्षा में उल्लेखनीय कार्य हेतु केन्द्र द्वारा सम्मानित किया गया। समारोह की अध्यक्षता आईयूसीटीई के निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह ने की।

प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, कुलपति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने कहा कि विद्यार्थियों को प्रेरित करने के लिए शिक्षकों को अपनी शिक्षण और मूल्यांकन पद्धति पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने ऑनलाइन शिक्षा के महत्व पर बल देते हुए कहा कि शिक्षकों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभावी उपयोग पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे वे अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार कर सकते हैं।

सारस्वत अतिथि व मुख्य वक्ता प्रो. बिहारी लाल शर्मा, कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने अपने संबोधन में कहा कि “सच्चा शिक्षक वही है जो अपने आचरण से शिक्षा देता है।” उन्होंने अपने वक्तव्य में शिक्षकों के पांच लक्षणों- प्रेरक:, सूचकः, वाचकः, दर्शकः, बोधकः की व्याख्या करते हुए बताया कि शिक्षकों का इन गुणों से परिपूर्ण होना न केवल विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक है, बल्कि शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को भी पूर्ण करता है।

प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, अन्तर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र, वाराणसी ने कहा कि ‘अच्छे शिक्षक ही अच्छे विद्यार्थी तैयार करेंगे’। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य चरित्र निर्माण है और इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षक को अपनी भूमिका पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा वह कर्ज है जिसे हम पिछली पीढ़ी से पाते हैं और अगली पीढ़ी को चुकाते हैं।

वहीं सम्मानित आचार्यों में, प्रो. सुभाष चन्द्र तिवारी, पूर्व आचार्य, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि शिक्षक का कार्य सूचना देना नहीं, जबकि विद्यार्थियों में नैतिकता व मूल्य की शिक्षा से उनमें राष्ट्र प्रेम की भावना का उदय करना होता है। प्रो. राम किशोर त्रिपाठी, पूर्व आचार्य, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने अपने वक्तव्य में कहा कि विद्यार्थी सबसे निकट गुरु के पास होता है इसलिए विद्यार्थी गुरु के ही चरित्र का अनुकरण करता है, इसीलिए समावर्तन संस्कार में कहा जाता है ‘जो मेरे अर्थात् गुरु समान सुचरित है जीवन में उन्हीं का अनुकरण करना, कुचरित का नहीं’। प्रो. राजनाथ उपाध्याय, पूर्व आचार्य, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी ने कहा कि एक शिक्षक में विषय-ज्ञान अति महत्त्वपूर्ण है किन्तु उससे कहीं अधिक विद्यार्थी की जरूरत व उसके बारे में समझ अति आवश्यक है। जिससे विद्यार्थी को सही दिशा में प्रेरित करना संभव होता है। प्रो. अरविन्द कुमार पाण्डेय, पूर्व आचार्य, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी ने कहा कि सूचना इत्यादि प्रदान करने में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस मददगार सिद्ध हो रही है किन्तु वह करुणा, क्षमाशीलता, सहृदयता, संवेदनशीलता के अभाव को भरने में सक्षम नहीं है, इसमें शिक्षक की भूमिका अत्यंत सार्थक हो जाती है। प्रो. हरीन्द्र प्रसाद सिंह, पूर्व आचार्य, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने तीन महत्त्वपूर्ण बातों को सबके साथ साझा करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को ‘राष्ट्र, इतिहास के बारे में जानना’ जरूरी है क्योंकि इसके बारे में विद्यार्थियों को कम जानकारी है जिसके ज्ञान से देश व राष्ट्र का उन्नयन सम्भव बन सकता है। स्वास्थ्य की शिक्षा सभी स्तरों पर आवश्यक है, साथ ही विद्यार्थियों को ‘वित्तीय साक्षरता’ का ज्ञान प्रदान करना देश के लिए अति लाभदायक सिद्ध होगा। प्रो. गीता राय, पूर्व आचार्य, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षक का भी अपना व्यक्तित्व है, उसकी आवश्यकताएं हैं, किन्तु उनकी मर्यादाओं का निर्धारण भी जरूरी है। उसे समृद्ध विरासत को धारण करने वाला और उसमें आचरण की सभ्यता का होना अति आवश्यक है. गुरु में ज्ञान के साथ समझदारी भी जरूरी है, जिससे ईमानदारी आती है जिससे देनदारी का भाव विकसित होता है।

इस अवसर पर केंद्र का परिचयात्मक वृत्ति चित्र व प्रो. जे. एस. राजपूत के भाषण का संक्षिप्त अंश भी प्रस्तुत किया गया।

मंगलाचरण डॉ. राजा पाठक, अतिथियों का स्वागत प्रो. आशीष श्रीवास्तव (संकाय अध्यक्ष, शैक्षणिक व शोध), धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अजय कुमार सिंह, संचालन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी ने किया।

इस कार्यक्रम में प्रो. सत्यजीत प्रधान, प्रो. राम पूजन तिवारी, प्रो. राजनाथ, प्रो. ललिता राव, प्रो. जितेंद्र शाही, डॉ. गोरख नाथ तिवारी, प्रो. ओ.पी. चौधरी, डॉ. रमेश यादव, प्रो. रश्मि सिंह, प्रो. अल्का रानी, डॉ. आकाश रंजन, डॉ. कौशलेंद्र सिंह, डॉ. विजय कुमार सिंह, प्रो. शैलेन्द्र वर्मा सहित विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों के 100 से अधिक गणमान्य शिक्षाविद उपस्थित रहे।

इस कार्यक्रम का समन्वयन प्रो. अजय कुमार सिंह, सह- समन्वयन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी व डॉ. अनिल कुमार ने किया।

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