
सुख हो या दुख सभी के बीच रहते हैं,
आँसू पोंछकर मुहब्बते पैग़ाम दिया करते हैं I
फिर भी उनको मेरी नेकियाँ नजर नहीं आती ,
जिनकी सलामत के लिए दुआयें करते हैं II1II
उनसे क्या मतलब कि वो मेरी खैरियत पूछें,
जो चाँद – सितारों के रिश्तों में गैरियत पूछें I
दौरे मुश्किल सफर में साथ छोड़ कर हँसते,
जिनकी सलामत के लिए दुआयें करते हैं II2II
वक़्त की सीढ़ियों पर हर उम्रे दराज चढ़ता है,
दिलो दर्द अपना बयां करने के लिए डरता है I
मेरे तकल्लुफ़ की कदर वे ख्वाब में भी नहीं करते,
जिनकी सलामत के लिए दुआयें करते हैं II3II
दुनिया वालों के समझ में क्यों नहीं आता,
बिगाड़ते प्यार का सुंदर सा आपसी नाता I
अब तो खास भाई भी राखी का कद्र नहीं समझते,
जिनकी सलामत के लिए दुआयें करते हैं II4II
नफरत की दीवारों को अब हटाना है,
प्रेम का रसधार अब हमें बहाना है I
“नरेश” कमी ढूढ़ने के लिए , वे कब्र तक खोद सकते हैं,
जिनकी सलामत के लिए दुआयें करते हैं II5II
कवि इंजी. राम नरेश “नरेश”
सिंगरौली. मध्य प्रदेश
