ईजी कवि रामनरेश नरेश 

 

हिंदी के भारत माँ के बिंदी

अब बनावइ के पड़ी,

तबही जुड़ि पाए सब

भाषा और परिभाषा के कड़ी II

 

शुरू करे अज्ञानी अ से

ज्ञ से ज्ञानी बनावे ,

सुंदर स्वर्ण जड़ित हीरा

मोती से शब्द सजावे I

 

देश के हर कोने कोने में

पहरू बनके रहे खड़ी,

हिंदी के भारत माँ के बिंदी

अब बनावइ के पड़ी II1II

 

बलिदानी बुंदेली, मगही,

मिथिला, अवध -बघेली,

बहू बनाती सब बोली को

हिंदी बनी सहेली I

 

स्वतंत्रता की ढाल बनी,

तलवार उठाके लड़ी,

हिंदी के भारत माँ के बिंदी

अब बनावइ के पड़ी II2II

 

रेल खेल में मेल करावे,

अब दक्षिण में भी भावे ,

पूरब पश्चिम उत्तर में

अपना परचम लहराए I

 

बिना अपने बोली भाषा के

मुँह छिपावइ के पड़ी

हिंदी के भारत माँ के बिंदी

अब बनावइ के पड़ी II3II

 

राष्ट् संघ में गूंजे एक दिन

हिंदी जग कल्याणी,

प्रेम परस्पर बढ़े आपसी

सुखी रहे हर प्राणी I

 

तमिल तेलगू मलयाली

सब मोतिन के मणी,

हिंदी के भारत माँ के बिंदी

अब बनावइ के पड़ी II4II

 

 

कवि इंजी. राम नरेश “नरेश”

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