तीन दिवसीय कार्यशाला का हुआ समापन

 

वाराणसी। रविवार को अन्तर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र, बीएचयू, वाराणसी व विश्व आयुर्वेद परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में “साइंटिफिक राइटिंग, रिसर्च इंटीग्रिटी एंड पब्लिकेशन एथिक्स” विषयक तीन दिवसीय कार्यक्रम का समापन आई.यू.सी.टी.ई. परिसर, वाराणसी में हुआ।

कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण, दीप प्रज्ज्वलन एवं महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर हुआ। मुख्य अतिथि प्रो० सत्येन्द्र प्रसाद मिश्र, पूर्व कुलपति, आयुर्वेद विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड एवं विशिष्ट अतिथि प्रो० कमलेश कुमार द्विवेदी, सदस्य, विश्व आयुर्वेद परिषद व एन.सी.आई.एस.एम., आयुष मंत्रालय, नई दिल्ली रहे। समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो० प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, बीएचयू, वाराणसी ने की।

यह कार्यशाला एन.सी.आई. एस.एम., आयुष मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा स्वीकृत तथा प्रतिभागियों के 10 क्रेडिट प्वॉइंट प्रशिक्षण पर केंद्रित रही।

मुख्य अतिथि प्रो० सत्येन्द्र प्रसाद मिश्र, पूर्व कुलपति, आयुर्वेद विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड ने अपने उद्बोधन में कहा कि विश्व आयुर्वेद संगठन आयुर्वेद को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, इसके लिए आयुर्वेद के बारे में समाज का सकारात्मक दृष्टिकोण बने। उन्होंने कहा कि पंचकर्म जैसी आयुर्वेदिक पद्धतियाँ केवल उपचार का साधन नहीं बल्कि समग्र समाज के स्वास्थ्य और जीवन गुणवत्ता सुधार का आधार हैं।

विशिष्ट अतिथि प्रो० कमलेश कुमार द्विवेदी, सदस्य, विश्व आयुर्वेद परिषद व एन.सी.आई. एस.एम., आयुष मंत्रालय, नई दिल्ली ने कहा कि आयुर्वेद जीवन का संतुलन स्थापित करने वाली भारतीय परम्परा है और इसे शोध व प्रमाणिकता के साथ वैश्विक स्तर पर स्थापित करना समय की आवश्यकता है।

समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो० प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, बीएचयू, वाराणसी ने कहा कि आयुर्वेद में औषधि चयन के साथ-साथ उसकी उचित मात्रा भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है जिसे गहन शोध के माध्यम से सुनिश्चित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से आयुर्वेद शोधार्थियों में प्रवीणता आयेगी।

कार्यशाला के तीसरे दिन की शुरुआत डॉ० वैषाली माली, काय चिकित्सा विभाग, आर०बी० आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय, आगरा के ‘भाषाई अवरोधों को दूर करना’ विषयक व्याख्यान से हुई जिसमें उन्होंने शोध लेखन और प्रकाशन में भाषा संबंधी चुनौतियों को पहचानने तथा उन्हें दूर करने के व्यावहारिक उपायों पर विस्तार से चर्चा की।

द्वितीय सत्र में प्रो० आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं शोध), आई.यू.सी.टी.ई., वाराणसी ने ‘रिसर्च इंटीग्रिटी एण्ड पब्लिकेशन एथिक्स इन रेफेरेंस टू एन.ई.पी. 2020’ विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि शोध की गुणवत्ता, पारदर्शिता और नैतिकता पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अत्यधिक बल देती है। संस्थानों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए शिक्षकों, शोधार्थियों सहित सभी हितधारकों को इनका अनुपालन अवश्य करना चाहिए।

आज के तृतीय वक्ता प्रो० अजय कुमार सिंह, संयोजक, नॉलेज क्रिएशन सेल, आई.यू.सी.टी.ई., वाराणसी ने “शोध प्रश्न और शोध उद्देश्य का निर्धारण” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि शोध समस्या की सही पहचान, शोध प्रश्नों की स्पष्टता और शोध उद्देश्यों की सटीकता सम्पूर्ण शोध प्रक्रिया को प्रभावी और गुणवत्तापरक बनती है।

अंतिम सत्र में डॉ० प्रसाद मामिडी, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, काय चिकित्सा विभाग, आर०बी० आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय, आगरा ने ‘लेटर टू द एडिटर, शार्ट कम्युनिकेशन, बुक रिव्यु’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि प्रभावी प्रकाशन शैलियों से शोधकर्ताओं को अकादमिक जगत में संवाद स्थापित करने और ज्ञान के आदान-प्रदान का अवसर मिलता है।

इस कार्यशाला के समन्वयक डॉ० विजय कुमार राय, अध्यक्ष, विश्व आयुर्वेद परिषद, उत्तर प्रदेश चैप्टर ने तीन दिवसीय कार्यक्रम की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि आयुर्वेद की वैश्विक पहचान देश के परम्परागत ज्ञान को आधुनिक शोध पद्धतियों और शिक्षा प्रणाली से जोड़कर समाज के व्यापक हित में लागू करने से सम्भव है। इस कार्यशाला के संयोजक प्रो० अजय कुमार सिंह, आईयूसीटीई, आयोजक सचिवद्वय डॉ० मनीष मिश्रा एवं डॉ० आशुतोष कुमार पाठक, सह-संयोजक डॉ० सुनील कुमार त्रिपाठी, आईयूसीटीई और कोषाध्यक्ष डॉ० राम निहोर तापसी रहे। समापन सत्र का सञ्चालन डॉ. आशुतोष कुमार पाठक ने किया व धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम संयोजक प्रो० अजय कुमार सिंह ने किया। इस कार्यशाला में देशभर से बड़ी संख्या में प्राध्यापकों और शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया।

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