
दुर्गाकुंड की देवी का दर्शन पूजन करने करने के लिए नवरात्र में आते हैं दूर-दूर से श्रद्धालु
वाराणसी। दुर्गाकुंड स्थित दुर्गा मंदिर सिद्ध स्थली है। दुर्गासप्तशती के चतुर्थ स्कंद मां कुष्मांडा के के चरित्र का वर्णन करते हुए देवी उपासिका साध्वी गीाताम्बा तीर्थ ने बताया की अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन मां के परमभक्त थे, और बनारस के राजा सुबाहु की पुत्री राजकुमारी शशिकला के स्वंय वर में भाग लेने आये थे, और जब वह स्वयं वर में विजयी हो गये तो, उनके सौतेले भाईयों व मामाओं ने उनपर आक्रमण कर सुबाहू व उनकी सेना को परास्त कर दिया। अपनी हार हाेते देख राजकुमार सुदर्शन एक पीपल के पेड़ के नीचे मां की प्रार्थना करने लगे, राजकुमार सुदर्शन की प्रार्थना पर मां प्रसन्न होकर प्रकट हुयी और दुश्मनों का परास्त कर राजकुमार सुदर्शन की जान बचाकर उनका राजपाट लौटायी।
इसके बाद राजकुमार सुदर्शन ने मां से प्रार्थना की वह इसी स्थान पर प्रतिष्ठापित होकर लोगों के कष्टों को दूर करें। तभी से यह स्थान मां कुष्माण्डा देवी के रूप में प्रसिद्ध हो गया और लोगों के श्रद्धा का केन्द्र बन गया। नवरात्र के चतुर्थ स्वरूप में मां कुष्माण्डा के दर्शन का विधान है।
18वीं शताब्दी बंगाल की महारानी भवानी ने मंदिर का निर्माण कराया। यह मंदिर वीसा यंत्र पर स्थापित है। इसमें मूर्ति पूजन के बजाय यंत्र पूजन होता है।
मंदिर के महंत विकास दुबे ने बताया कि मां कुष्मांडा का श्रद्धा भाव से जो भी भक्त 40 दिनों तक दर्शन पूजन करता हैं उसकी सभी मन की इच्छा मां पूरी करती है।
