वाराणसी। अर्दली बाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय (एलटी कॉलेज) में शनिवार को विद्यानिवास मिश्र जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास द्वारा हिंदी धरोहर–काशी की सृजन परंपरा श्रृंखला के आठवें चरण में बाबू राधा कृष्ण दास और राय कृष्ण दास के विराट साहित्यिक एवं सांस्कृतिक योगदान पर संगोष्ठी आयोजित हुई। शुभारंभ अतिथियों द्वारा वाग्देवी के चित्र पर माल्यार्पण, मंजरी पांडेय के मंगलाचरण तथा स्वागत भाषण के साथ हुआ। विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्रा ने विषय स्थापना करते हुए कहा कि यह आयोजन श्रृंखला काशी की साहित्यिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार कर रही है। वक्ता हिमांशु उपाध्याय ने कहा कि बाबू राधा कृष्ण दास हिंदी साहित्य में भारतेंदु युग के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। उनके पद्य–गद्य लेखन में भारतेंदु की अनुगूंज स्पष्ट दिखती है। उन्होंने समसामयिक लेख, कविता, नाटक सहित अनेक कृतियों से साहित्य को समृद्ध किया और नागरी प्रचारिणी सभा, अग्रवाल समाज तथा हरिश्चंद्र स्कूल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की प्रो.प्रीति जायसवाल ने पुरातत्वविद एवं गद्य-गीत विधा के जनक राय कृष्ण दास के योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय मूर्ति कला तथा भारत की चित्रकला जैसी कालजयी कृतियाँ उनकी देन हैं। ब्रज और खड़ी बोली दोनों में रचनाएँ लिखने वाले राय कृष्ण दास साहित्यकारों के बीच अत्यंत सम्मानित रहे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का भारत कला भवन उनके कला समर्पण का जीवंत साक्ष्य है। अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार ओम धीरज ने कहा कि राधा कृष्ण दास और राय कृष्ण दास जैसे व्यक्तित्व साहित्य इतिहास के अमूल्य स्तंभ हैं, जिन्हें पुनर्स्मरण करना आवश्यक है। संचालन वासुदेव ओबेरॉय, धन्यवाद ज्ञापन संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने किया।इस अवसर पर साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह , डॉ प्रकाश उदय,गिरिजेश तिवारी,गिरीश पांडेय,डॉ शशिकला पाण्डेय,दीपेश चौधरी आदि थे। शिवकुमार पराग ने कार्यक्रम में अपनी गीतों से सभी को रस से भर दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *